हम केवल डाटा हैं, जिसे अपने व्यवसाय या अन्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रयोग किया जा सकता है। हमारी पसंद-नापसंद को नियंत्रित किया जा सकता है। हमारे ऊपर निगरानी रखी जा सकती है। ये सब पहले हो चुका है, फ़िलहाल हो रहा है और आगे भी होगी - इसकी अपार संभावनाएँ हैं। आरोग्य सेतु एप्लीकेशन को किसने बनाया- इस सवाल पर NIC के पास कोई जानकारी नहीं थी। इश स्थिति ने अन्य सवालों को जन्म दिया। जैसे -
कौन इसके ज़रिए डाटा संग्रहित कर रहा है?
इस डाटा का क्या उपयोग किया जाएगा?
आरोग्य सेतु एप्लीकेशन से आम लोगों को किस तरह का ख़तरा हो सकता है?
आम लोगों को अपनी निजता की रक्षा के लिए क्या करा चाहिए?
खुद पीएम मोदी ने इस एप्लीकेशन की मार्केटिंग की थी
आरोग्य सेतु एप्लीकेशन को सरकार कितना महत्वपूर्ण मानती थी, इसका अंदाज़ा इस बात से ही लग जाता है कि प्रधानमंत्री और सरकार के बहुत सारे नुमाइंदे ख़ुद इसे डाउनलोड करवाने को आतुर दिखे। इस अपील का व्यापक असर हुआ। 10 करोड़ से अधिक लोग अब तक इस एप्लीकेशन को डाउनलोड कर चुके हैं।
शुरुआती चरण में भी डाटा सिक्योरिटी का सवाल उठा। लेकिन सरकार की ओर से कहा गया कि इसके निर्माण में किसी प्रइवेट ऑपरेटर का हाथ नहीं है। आरोगय सेतु का डाटा सुरक्षित है। लेकिन 6 महीने बाद क़ानून मंत्री की बात झूठी साबित हो गई। सरकार ने एक स्पष्टीकरण में साफ़ किया है कि आरोग्य सेतु के निर्माण में निजी कम्पनियों का सहारा भी लिया गया है। सरकार भरोसा जीतने में लगातार नाकामयाब हो रही है, लेकिन लगातार भरोसा जताने की अपील भी कर रही है।
आरोग्य सेतु का मक़सद क्या था?
सरकार के मुताबिक़ - आरोग्य सेतु का मक़सद था कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग।
राहुल गांधी या विपक्ष के मुताबिक़ इसका मक़सद था लोगों को ट्रैक करना, उनके डाटा पर नियंत्रण रखना, उनकी मूवमेंट पर निगरानी रखना।
एप्लीकेशन को बने 6 महीने से अधिक समय हो गया है, अब क्या हो रहा है -
आरोग्य सेतु जिसे कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग करना था, उसके निर्माताओं की ट्रेसिंग हो रही है, मतलब ये पता लगाने की जद्दोजहद चल रही है कि इसे बनाया किसने?
सोशल मीडिया पर खूब मीम चल रहे हैं। दो तीन ट्विटर एकाउंट्स ने ख़ुद को इसका निर्माता घोषित कर दिया है तो कुछ एकाउंट्स इसे बी एक्ट ऑफ गॉड कह रहे हैं।
क्यों बना ऐसा माहौल?
सौरव दास नाम के एक व्यक्ति ने RTI फाइल कर सूचना मांगी कि किसने बनाया आरोग्य सेतु? एप्लीकेशन की वेबसाइट और गूगल प्ले स्टोर पर लिखा है कि ये भारत सरकार की एप है और NIC ने इसे बनाया है। लेकिन National Informatics Centre ने RTI के जवाब में से सूचना दी - हमें नहीं पता कि आरोग्य सेतु को किसने बनाया है।
फिर शिकायत पहुँची Central Information Commission के पास। CIC ने सूचना अधिकारियों को शो कॉज नोटिस भेजी कि काहे नहीं दे रहे हो सूचना। इसके बाद एक स्पष्टीकरण आया सरकार की तरफ से। सरकार ने लिखा कि आरोग्य सेतु का निर्माण सरकार और निजी क्षेत्र के मिले-जुले प्रयास से हुआ है।
अब आम लोगों के पास क्या विकल्प है?
दो विकल्प हैं -
भरोसा कर लें - सरकार ने जो कहा उसपर शब्दशः और भूल जाए इस सवाल को। या फिर अपने मन को समझा लें, कि जिस एप्लीकेशन को डाउनलोड करने की अपील स्वयं मोदी जी ने की हो उससे कुछ ग़लत नहीं हो सकता। किसने बनाया-क्यों बनाया या क्या ख़तरे हो सकते हैं जैसे सवालों को बेकार के सवाल मान लें।
एक दूसरा विकल्प है - सरकार ने जो कहा उसके लिए उससे साक्ष्य माँगे जाएँ। पूरी डिटेल्स सांझा करने की अपील की जाए, कितना, किसका और क्या-क्या डाटा कलेक्ट किया गया है! TV Show Host तहसीन पूनावाला ने मुख्य न्यायधीश को चिठ्ठी लिखकर इस मामले में स्वतः संज्ञान लेने का निवेदन भी किया है और मांग की है कि सेतु के द्वार संग्रहित अब तक के डाटा को डिलीट किया जा सके।
आरोग्य सेतु एप्लीकेशन से ख़तरा क्या है?
ख़तरा है नियंत्रण का, आप कहाँ हैं, कहाँ जा रहे हैं - ये आपकी निजी सूचना है। आरोप हैं कि आरो्ग्य सेतु इसे निजी नहीं रहने देगी। सरकार के पास आपकी ये सूचना होगी। आपकी ट्रैवल हिस्ट्री, मेडिकल हिस्ट्री के बारे में भी जानकारी होगी।
डाटा इज़ दि न्यू मनी! ये आप सबने सुना होगा। डाटा इकठ्ठा कर इस तरह से भी फ़ायदे कमाए जा सकते हैं। बिहेवरियल एनालायसिस के ज़रिए कम्पनियाँ अपने फ़ायदे के लिए डाटा का उपयोग कर सकती हैं। मतलब डाटा की माँग खूब है। और आरोग्य सेतु से डाटा गैदरिंग भी खूब हो रही है। तो क्या डाटा की पूर्ति नहीं की जा सकती? बिल्कुल की जा सकती है, संभावनाएँ हैं। कोरोनावायरस के दौर में फार्म्यास्यूटिकल्स कम्पनियाँ ख़ासतौर पर इस डाटा का प्रयोग कर सकती हैं।
डाटा सिक्योरिटी के तमाम सवालों के बीच हमारे निजता को ख़तरा है, इस ख़तरे के ख़िलाफ़ कम से कम सवाल तो किए ही जा सकते हैं।

