वो शाम, वो रात, वो भीड़, वो मरते अपने लोग,
वो चीख, वो आग, वो तड़पता आदमी, वो बिलखती पत्नी
अनाथ बच्चे, वो जले बुझे से मकान !!
ये सब सोच कर ही मानों रूह सी काँप उठती है| क्या माहौल होगा उस समय, आखिर एक इंसान के अंदर राजनीति में आते ही इतनी शक्ति कैसे आ जाती है कि वो किसी को भी चंद मिनटों में जला कर राख कर दे| ना कोई शासन ना कोई प्रशासन सब चश्मदीद बने जा रहे थे, उस काले दिन के जब खुले आम "इंसानियत" को जलाया जा रहा था| जब मुँह से निकलती चीख मुँह में ही रह जा रही थी, जब धर्म के नाम पर इंसानियत को राख किया जा रहा था, जब सरकार के कुछ शागिर्द शैतान बने फिर रहे थे और लोगों को घरों से निकाल कर हैवानियत की मशाल जला रहे थे|
1984 सिख विरोधी दंगा था क्या?
साल 1984 में सिख विरोधी दंगे इंडियन सिखों के खिलाफ थे। इसके पीछे कारण था तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या, जिनकी हत्या उन्हीं के अंगरक्षकों ने की थी जो कि सिख थे। इन दंगों के कारण भारत में खून की होली खेली गई थी। इन दंगों में 3000 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी, जिसमें 2000 से ज्यादा लोग दिल्ली में मारे गये थे। इन दंगों पर काफी सियासत खेली गई थी क्योंकि नरंसहार के बाद सीबीआई ने कहा था कि ये दंगे राजीव गांधी के नेतृ्त्व वाली कांग्रेस सरकार और दिल्ली पुलिस ने मिल कर कराये हैं। उस समय तत्कालीन पीएम राजीव गांधी का एक बयान भी काफी सुर्खियों में था जिसमें उन्होंने कहा था कि जब एक बड़ा पेड़ गिरता है, तब पृथ्वी भी हिलती है।
इंदिरा गाँधी के मौत के बाद 1 व 2 नवंबर को दिल्ली कैंट एरिया में तनाव का माहौल हो गया| एक सुनियोजित भीड़ ने बाकायदा पूरी प्लानिंग के साथ सिख परिवारों के घरों को चिन्हित कर उन्हें मारने के मकसद से सड़कों पर उतर आए| यह भीड़ किसी और की नहीं कुछ कांग्रेसी नेताओं की देन थी, उनके द्वारा उकसाई हुई यह भीड़ जो चंद रुपयों और वफादारी दिखाने के लिए हैवानियत के अंतिम दर्जे तक जा पहुंची| शहर धूं धूं कर जल रहा था, लोग चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे| क्योंकि उस समय खुद खाकी वर्दी "माचिस" पकड़ाने का काम कर रही थी|
शहर "खाकी" ने जलाया, सज्जन की इतनी कहाँ मजाल
जब शहर में सब जल रहा था| जब लोग घरों में दुबके बैठे थे| जब घरों में घुस सिखों को जलाया जा रहा था, आखिर तब शासन-प्रशासन मौन क्यों बैठा था अक्सर लोग ये सवाल उठाते रहते हैं| लेकिन सच तो ये है उस समय जो भी हो रहा था वो "खाकी" के संरक्षण और नेतृत्व में हो रहा था| अगुवाई भले सफ़ेद पोश वाले कर रहे थे लेकिन उनको शह और माचिस देने का काम वहां मौजूद पुलिसवाले ही कर रहे थे| कैंट के इतर बितर ही जब दंगा बढ़ गया तो स्थानीय निवासी निर्मल सिंह ने पुलिस से मदद की गुहार की और शागिर्दों के खिलाफ कार्यवाही की मांग करने लगे| तभी पुलिस ने उन्हें समझौते की बात कहकर थाने चलने को कहा और घर से निकलते ही, करीब 100 मीटर की दूरी पर उन्हें दंगाइयों के हवाले कर दिया| दूर खड़े परिजन देख ही रहे थे कि उन्हें मिटटी के तेल (केरोसीन) से नहला दिया गया| लेकिन किसी के पास माचिस नहीं मिली, उतने में ही मौजूद पुलिस वाले ने "तुमसे एक मुर्गा नहीं जलाया जा सकता कहकर "माचिस पकड़ा दिया| निर्मल सिंह को खुलेआम जला दिया गया (चश्मदीद के मुताबिक़) | पुलिस वाले हाँकेँ जा रहे थे और जैसा की कहा जाता है उन्हें हांकने वाला गरड़िया था "सज्जन कुमार" l
सिख दंगे के एक मामले की सुनाई के दौरान 17 नवम्बर को दिल्ली हाई कोर्ट ने पुराने कांग्रेसी नेता सज्जन कुमार को आरोपी ठहराते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई| इसी बीच एक बार फिर राजनीति गरम हो गयी और फिर भाजपा को मौका मिल गया|
राजनीति में अब "Is EQUAL TO" की राजनीति का खेल हो रहा है| जब 1984 की बात आती है तो 2002 गोधरा काण्ड का जिक्र छेड़ दिया जाता है| जब राफेल की बात आती यही तो अगस्ता वेस्टलैंड और बोफोर्स पर हमला किया जाता है| equalize करने का ये खेल लोकतंत्र को दिन ब दिन कमजोर कर रहा है| लेकिन सियासत इस खेल में माहिर हो चुकी है l अपनी और लोकतंत्र की रक्षा के लिए हमें यह सुनिश्चित करना होगा की पुराने दिनों में किया हुआ नरसंहार आज के दिनों में ऐसा करने का लाइसेंस ना बन जाएl

