क्या कहा योगी आदित्यनाथ ने?
इसके बाद उन्होंने भारत की पुरानी आर्थिक ताक़त का ज़िक्र किया कि लगभग 300 साल पहले, भारत दुनिया की अर्थव्यवस्था में 25% का योगदान करता था। यानी दुनिया की कुल GDP में भारत का हिस्सा एक-चौथाई था। उन्होंने कहा कि उस वक्त भारत का मतलब आज का भारत ही नहीं बल्कि पाकिस्तान और बांग्लादेश भी है, जिसे वे “वृहत्तर भारत” कहते हैं। योगी के शब्दों में, भारत उस दौर में दुनिया की नंबर-वन आर्थिक ताक़त था, सबसे बड़ा उत्पादक देश था और कृषि में तो उसका कोई मुकाबला ही नहीं था। और फिर उन्होंने इस समृद्धि के पतन के पीछे कारण गिनाए, उन्होंने कहा कि बाहरी ताक़तों ने हमें जाति के नाम पर बांटा, क्षेत्र और भाषा के नाम पर बांटा और आज भी वही विदेशी मानसिकता देश को पीछे धकेल रही है।
कितनी सच्चाई है योगी आदित्यनाथ के दावे में?
सन् 1590 के आसपास, मुग़ल बादशाह अकबर ने अपने दरबारी अबुल फ़ज़ल को पूरे साम्राज्य की व्यवस्था दर्ज करने का काम सौंपा। इस काम का परिणाम था आइन-ए-अकबरी एक दस्तावेज़ जिसमें खेती, कर व्यवस्था, प्रशासन, गांवों की संख्या और घरानों का ब्योरा लिखा गया। इस किताब में सीधे-सीधे “भारत की कुल जनसंख्या” का कोई एक आंकड़ा नहीं दिया गया। लेकिन इसमें दर्ज विवरण, जैसे गांव और हर गांव में कितने घराने हैं, ने आगे के इतिहासकारों को जनसंख्या का अनुमान लगाने का आधार दिया। औसतन प्रति घर 4–5 लोग मानकर इतिहासकारों ने अनुमान निकाला कि अकबर के समय पूरे मुग़ल साम्राज्य की आबादी लगभग 14 से 15 करोड़ रही होगी। कुछ इतिहासकार 16-17 करोड़ मानते हैं
अगर इससे भी पीछे साल 1100 के आसपास जाये तो जनसंख्या से जुड़े दस्तावेज बिल्कुल ही मौजूद नहीं है। लेकिन फिर भी इतिहासकारों ने राजनीतिक हालात, खेती-बाड़ी और कर व्यवस्था देखकर एक अंदाज़ा लगाने की कोशिश की है। उस समय दक्षिण भारत में चोल राजवंश का राज था। उत्तर और पश्चिम में अलग-अलग राजपूत राज्य सक्रिय थे, और उत्तर-पश्चिमी सीमाओं पर गजनवी और गौरी शासकों का असर दिखने लगा था। अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि पर आधारित थी और गाँव घनी आबादी वाले थे।
जमीन और कर से जुड़े अभिलेख, मंदिरों की आय-व्यय की सूची और स्थानीय प्रशासन के रिकॉर्ड मौजूद थे, लेकिन पूरे उपमहाद्वीप के लिए कोई संपूर्ण या एकीकृत गणना नहीं की गई थी। फिर भी कुछ संकेत मिलते हैं। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु में चोल राजवंश के अभिलेख हैं, जिनमें हजारों गाँवों के कर और भूमि संबंधी ब्योरे दर्ज हैं। 11वीं सदी में भारत आए फारसी विद्वान अल-बिरूनी ने यहाँ की खेती, घनी आबादी और व्यापार का ज़िक्र किया, हालांकि उसने कोई संख्या नहीं दी। इसके अलावा, जैन और बौद्ध ग्रंथों में भी शहरों और व्यापारिक गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। इन बिखरे हुए संकेतों और अभिलेखों के आधार पर आधुनिक आर्थिक इतिहासकारों ने अंदाज़ा लगाया है कि 1000 से 1200 ईस्वी के बीच पूरे भारतीय उपमहाद्वीप जिसमें आज का भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल का बड़ा हिस्सा शामिल है की कुल जनसंख्या लगभग 7 से 9 करोड़ के बीच रही होगी।





