2010 का मॉक पार्लियामेंट
साल 2010 में भारतीय संसदीय इतिहास में एक अभूतपूर्व घटना घटी जब विभिन्न राजनीतिक दलों ने मतभेद भुलाकर लोकसभा में एक घंटे से अधिक समय तक मॉक पार्लियामेंट का आयोजन किया। इस दौरान राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता लालू प्रसाद यादव को प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित किया गया, जबकि भाजपा के वरिष्ठ नेता गोपीनाथ मुंडे ने स्पीकर की भूमिका निभाई। यह आयोजन तब हुआ जब सांसदों के वेतन वृद्धि के मुद्दे पर भारी हंगामा मचने के कारण सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी गई थी।
जैसे ही सदन की कार्यवाही रुकी, लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में विपक्षी सांसदों ने खुद ही कार्यवाही को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। इस दौरान समाजवादी पार्टी (SP) के पूर्व प्रमुख मुलायम सिंह यादव को उपाध्यक्ष के रूप में चुना गया ताकि सदन का संचालन smoothly हो सके।
सांसदों की भागीदारी
इस मॉक पार्लियामेंट में लगभग 70 सांसदों ने भाग लिया, जिनमें भाजपा, वामपंथी दल, समाजवादी पार्टी और राजद के सदस्य शामिल थे। भाजपा नेता मेनका गांधी ने 'मेडिकल काउंसिल बिल' पर भाषण दिया, जिसे सरकार ने बिना चर्चा के ही पारित कर दिया था। इस दौरान संसद की सुरक्षा सेवा ने प्रेस गैलरी को तुरंत खाली कराया, ताकि मीडिया इस घटनाक्रम को कवर न कर सके।
यह मॉक पार्लियामेंट भूख हड़ताल की तरह था, जिसमें सांसदों द्वारा वेतन वृद्धि की मांग को मजबूती से उठाया गया। केंद्रीय कैबिनेट ने सांसदों का मूल वेतन 16,000 रुपये से बढ़ाकर 50,000 रुपये करने का प्रस्ताव पारित किया था, लेकिन लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव ने 80,000 रुपये की वेतन वृद्धि की मांग की।
लोकसभा अध्यक्ष की प्रतिक्रिया
तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने इस घटनाक्रम पर कड़ी असहमति जताई और कहा, 'संसद लोकतंत्र का मंदिर है और इसके साथ सर्वोच्च सम्मान और गरिमा का व्यवहार किया जाना चाहिए।' इसके साथ ही सत्ताधारी दल और भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने इस घटना को लोकतंत्र का मजाक करार दिया।
हाल ही में इस प्रकार की एक और कोशिश की गई, हालांकि इस बार मॉक पार्लियामेंट का आयोजन संसद में नहीं, बल्कि मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर किया गया। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग की गई और एसआईआर की प्रक्रिया को रद्द करने का प्रस्ताव रखा गया।





