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सियांग डैम विवाद: अरुणाचल प्रदेश में स्थानीय संघर्ष और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन

स्थानीय आदिवासियों की चिंताएँ और राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा

सियांग डैम विवाद: अरुणाचल प्रदेश में स्थानीय संघर्ष और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन
फोटो: Siang Dam Controversy: Balancing Local Struggles and National Security in Arunachal Pradesh

सियांग परियोजना का राजनीतिक संघर्ष

अरुणाचल प्रदेश में 11,200 मेगावाट की सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना (SUMP) के खिलाफ उठे जनआक्रोश ने अब केवल स्थानीय आंदोलन का रूप नहीं लिया, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय आदिवासियों के अस्तित्व के बीच एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संघर्ष बन चुका है। केंद्र और राज्य सरकार इस मेगा-डैम को चीन के जल-हमलों के खिलाफ भारत की सबसे बड़ी ढाल मानते हैं, जबकि सियांग घाटी में 'आदि' समुदाय के लोग इसे अपनी भूमि, पर्यावरण और सांस्कृतिक पहचान के लिए एक गंभीर खतरा मानते हैं।


भारत ने चीन के तिब्बत में निर्मित 60,000 मेगावाट के मेगाडैम के जवाब में इस परियोजना को अत्यंत आवश्यक बताया है। हालांकि, प्रश्न यह है कि क्या यह बांध वास्तव में चीन की गतिविधियों का मुकाबला कर पाएगा?


सुरक्षा के दृष्टिकोण से परियोजना का मूल्यांकन

इस बांध के निर्माण को लेकर राज्य सरकार का तर्क है कि यह चीन के तिब्बत स्थित 'सुपर-डैम' के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करेगा। अक्टूबर 2026 में अरुणाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री चोवना मेन ने स्पष्ट किया कि दोनों परियोजनाओं की तुलना केवल बिजली उत्पादन के आधार पर नहीं की जा सकती। चीन का मेडोग प्रोजेक्ट लगभग 5.5 अरब घन मीटर पानी रोकने की क्षमता रखता है, जबकि भारत का SUMP डैम 9.2 अरब घन मीटर पानी स्टोर करने में सक्षम होगा।


सरकार का कहना है कि यदि चीन तिब्बत से अचानक पानी छोड़ता है, तो यह जलाशय एक 'बफर' का काम करेगा, जिससे पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने का समय मिलेगा। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह बांध चीन की गतिविधियों को रोकने में असमर्थ रहेगा और केवल भारत के अंदर जल प्रबंधन की क्षमता को बढ़ाएगा।


बाढ़ नियंत्रण और अन्य संभावनाएँ

सियांग और ब्रह्मपुत्र घाटी में हर साल आने वाली बाढ़ को नियंत्रित करने के लिए इस परियोजना को एक महत्वपूर्ण कदम बताया जा रहा है। सरकार का तर्क है कि यह मल्टीपर्पज बांध बाढ़ नियंत्रण में मदद कर सकता है। यदि एक बड़ा जलाशय स्थापित होता है, तो पहाड़ों से आने वाले उफान को रोककर धीरे-धीरे पानी छोड़ा जा सकेगा, जिससे अरुणाचल और असम में बाढ़ से राहत मिल सकती है।


हालांकि, बाढ़ नियंत्रण की सफलता इस पर निर्भर करती है कि भारी बारिश के दौरान बांध में कितना खाली स्थान उपलब्ध है। अचानक बादल फटने जैसी परिस्थितियों में केवल बांध के भरोसे पूरी तरह से बाढ़ से बचना संभव नहीं होगा।


बिजली उत्पादन और स्थानीय जनसंख्या की चिंताएँ

यह डैम 11,200 मेगावाट की स्थापित क्षमता के साथ भारत की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक बन सकता है। इससे न केवल पूर्वोत्तर क्षेत्र बल्कि पूरे देश के राष्ट्रीय ग्रिड को बिजली उपलब्ध होगी। यह परियोजना राज्य में रोजगार और अवसंरचना विकास का भी वादा करती है।


हालांकि, आदिवासी समुदाय में गुस्सा बढ़ रहा है। स्थानीय निवासियों को चिंता है कि इस विशाल डैम के निर्माण से 27 से अधिक गांव, उपजाऊ कृषि भूमि और सांस्कृतिक स्थल जलमग्न हो जाएंगे। पूर्वी हिमालय का यह क्षेत्र 'सीस्मिक जोन' में आता है, जिससे यहां बड़े बांध का निर्माण संभावित प्राकृतिक आपदाओं का कारण बन सकता है।


आगे की राह और स्थानीय चिंताएँ

सरकार ने वर्तमान में प्री-फीजिबिलिटी रिपोर्ट तैयार करने का कार्य शुरू कर दिया है और भूगर्भीय परीक्षण किए जा रहे हैं। निर्माण कार्य प्रारंभ करने से पहले कई कानूनी, पर्यावरणीय और सामाजिक अनुमतियों की आवश्यकता होगी।


चीन द्वारा तिब्बत में किए गए अवसंरचना विकास ने सियांग परियोजना को राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बना दिया है, लेकिन जब तक स्थानीय लोगों की चिंताओं और विस्थापन संबंधी मुद्दों का उचित समाधान नहीं किया जाता, तब तक सियांग घाटी में शांति की बहाली चुनौतीपूर्ण बनी रहेगी।