18 सितंबर को कलेक्टर के थर्पगराज ने सड़क का शिलान्यास किया। यह सड़क उस निजी ज़मीन पर बनाई जा रही है, जहां अब तक एक कच्चा रास्ता मौजूद था। इसी रास्ते का उपयोग अनुसूचित जाति के लोग दशकों से अपने मृतकों को श्मशान घाट तक ले जाने के लिए करते रहे हैं। भूमि दान करने वाले वन्नियार समुदाय के भू-मालिकों की प्रशासन ने सार्वजनिक भलाई के लिए सराहना की। लेकिन गांव के अनुसूचित जाति के निवासियों का आरोप है कि उनकी असली मांग को दरकिनार कर दिया गया।
दशकों पुराना भेदभाव
मोथाक्कल गांव में लगभग 200 आदि द्रविड़ परिवार रहते हैं। उनका कहना है कि वर्षों से उन्हें मुख्य सार्वजनिक सड़क का उपयोग करने नहीं दिया जाता। दो हफ्ते पहले, जब एक शवयात्रा मुख्य सड़क से ले जाने की कोशिश हुई, तो पुलिस और राजस्व अधिकारियों ने यह कहते हुए रोक दिया कि वैकल्पिक रास्ता पहले से मौजूद है।
गांव के निवासी अरविंद कहते हैं, “मुख्य सड़क का उपयोग करने पर हमें डराया-धमकाया जाता है। ऊंची जाति के ग्रामीणों का दबदबा इतना है कि हम बार-बार सोचते हैं, क्या हम कभी बराबरी पा सकेंगे”?
अदालत से लेकर प्रशासन तक
दिसंबर 2024 में जी. मुनियप्पन नामक निवासी ने मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें पुलिस सुरक्षा की मांग की गई थी ताकि अनुसूचित जाति के लोग मुख्य सड़क का उपयोग कर सकें। अप्रैल 2025 में अदालत ने पुलिस को सुरक्षा देने का निर्देश भी दिया। लेकिन चार महीने बाद भी हालात जस के तस हैं। “जब हम पुलिस से मदद मांगते हैं, तो वे कहते हैं कि वे नया विवाद नहीं चाहते,” अरविंद बताते हैं।
किसके लिए है नई सड़क?
स्थानीय लोगों का कहना है कि नई सड़क वन्नियार समुदाय के किसानों के लिए ज़्यादा फायदेमंद होगी, क्योंकि वे इसका इस्तेमाल अपने ट्रैक्टर और कृषि कार्यों के लिए कर सकेंगे। “यह हमारे लिए नहीं बनी। हमें जो चाहिए था, वह हमें अब भी नहीं मिला,”मयन कहते हैं।
मोथाक्कल का यह मामला बताता है कि बुनियादी ढांचे के नाम पर विकास की परियोजनाएं कभी-कभी सामाजिक बराबरी की असली मांग को ढक देती हैं। यहां सवाल सिर्फ सड़क का नहीं, बल्कि उस रास्ते का है जो समानता की ओर जाता है।
दलित उत्पीड़न के भारत में कई मामले
यह मामला सिर्फ तमिलनाडु का नहीं है।मध्य प्रदेश में युवाओं को नंगा कर चार दिन तक टॉर्चर किया गया उनके प्राइवेट पार्ट्स में मिर्च डाल दी गई , यूपी में 14 साल के दलित बच्चे को पुलिस ने लात मारी क्योंकि वो प्रोटेस्ट कर रहा था, 4 बढ़ी जाती के लोगों ने एक दलित को पेड़ से बांधकर बुरी तरह पीटा उसकी गलती बस इतनी थी कि वो उनके एरिये से गुजर रहा था ,राजस्थान में दलित महिला को खेत में गिराकर पुलिस ने लठियों से पीटा ओर उस वक़्त कोई महिला पुलिस वाला मौजूद नहीं थी। कहीं दलित को इंसानी मल खाने पर मजबूर किया जाता है, तो कहीं सिर्फ नाम के आगे ‘राजा’ शब्द लगाने पर उसकी बेरहमी से पिटाई कर दी जाती है।
NCRB की रिपोर्ट 2014 से 2022 तक दलित महिलाओं पर हिंसा के मामलों में 78% और बलात्कार के मामलों में 89% की बढ़ोतरी हुई है। जिसमें यूपी, एमपी और राजस्थान जैसे राज्यों में हालात सबसे खराब हैं।
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