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सरकारी स्कूलों में एंट्री बैन: बच्चों की निजता की चिंता या बदहाली पर पर्दा डालने की कोशिश?

बच्चों की सुरक्षा बनाम सरकारी स्कूलों की जवाबदेही

सरकारी स्कूलों में एंट्री बैन: बच्चों की निजता की चिंता या बदहाली पर पर्दा डालने की कोशिश?
फोटो: AI Generated Image

बच्चों की सुरक्षा जरूरी है। उनकी निजता का सम्मान होना चाहिए। स्कूल ऐसी जगह होनी चाहिए, जहां बच्चे बिना डर के पढ़ सकें और माता-पिता को उनकी सुरक्षा का भरोसा हो। इस बात पर शायद ही किसी को आपत्ति हो। लेकिन अगर किसी सरकारी स्कूल की छत जर्जर है, बच्चे टूटी इमारत में पढ़ रहे हैं, शिक्षक नहीं हैं या मिड-डे मील में गड़बड़ी हो रही है, तो इन कमियों को सामने कौन लाएगा? अगर कोई अभिभावक अपने बच्चे की पढ़ाई और स्कूल का माहौल देखने जाना चाहे, तो क्या उसे भी लिखित अनुमति लेनी होगी? गुजरात सरकार ने राज्य के करीब 46,000 सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और फोटो-वीडियो बनाने के लिए लिखित अनुमति अनिवार्य कर दी है। सरकार इसे बच्चों की सुरक्षा और निजता से जुड़ा कदम बता रही है, जबकि विपक्ष को आशंका है कि इससे स्कूलों की कमियां सामने लाना मुश्किल हो सकता है।

सवाल सिर्फ स्कूल में प्रवेश का नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा और सरकारी स्कूलों की जवाबदेही के बीच संतुलन का है।

गुजरात में आखिर सरकार ने क्या बदल दिया?

गुजरात सरकार के शिक्षा विभाग ने 21 अक्टूबर 2026 को एक सर्कुलर जारी किया। इसके तहत राज्य के करीब 46 हजार सरकारी प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश के लिए नए नियम लागू किए गए हैं। नियमों के मुताबिक, स्कूल में प्रवेश करने के लिए प्रिंसिपल या संस्थान के प्रमुख से पहले लिखित अनुमति लेनी होगी। यह शर्त छात्रों के माता-पिता और अभिभावकों पर भी लागू होती है। ड्यूटी पर आए अधिकृत सरकारी अधिकारियों को इससे छूट दी गई है।

स्कूल में प्रवेश करने वाले हर व्यक्ति को आगंतुक रजिस्टर में अपनी जानकारी दर्ज करनी होगी। कक्षाओं, प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों, छात्रावासों, खेल के मैदानों और दूसरे हिस्सों में जाने के लिए भी अलग अनुमति जरूरी होगी। इतना ही नहीं, छात्रों, शिक्षकों या स्कूल की गतिविधियों की फोटो खींचने, वीडियो बनाने, इंटरव्यू लेने, ऑडियो रिकॉर्ड करने और लाइव स्ट्रीमिंग के लिए भी प्रिंसिपल की पहले से लिखित अनुमति लेनी होगी। नियमों का उल्लंघन करने, बिना अनुमति प्रवेश करने या स्कूल के कामकाज में बाधा डालने पर संबंधित अधिकारियों और पुलिस को सूचना दी जा सकती है।

यानी अब अगर किसी अभिभावक को स्कूल के भीतर कोई समस्या दिखाई देती है और वह उसका वीडियो बनाना चाहता है, तो उसे भी पहले अनुमति लेनी होगी। हालांकि, नियमों का मतलब यह नहीं है कि हर तरह की शिकायत या स्कूल की हर कमी को दिखाना अपने आप में अपराध हो गया है। कार्रवाई संबंधित कानून और वास्तविक उल्लंघन के आधार पर ही होनी चाहिए।

सरकार का तर्क: बच्चों की सुरक्षा और निजता

गुजरात सरकार ने अपने फैसले के पीछे बच्चों की सुरक्षा, सम्मान और निजता को वजह बताया है। शिक्षा विभाग ने संविधान के अनुच्छेद 21, निजता को मौलिक अधिकार मानने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के दिशानिर्देशों का हवाला दिया है।

सरकार का तर्क है कि स्कूल में आने वाले हर व्यक्ति की गतिविधियों पर नजर रहनी चाहिए। बच्चों की तस्वीरों और निजी जानकारियों का गलत इस्तेमाल हो सकता है। कोई बाहरी व्यक्ति स्कूल में आकर बच्चों को परेशान करे, पढ़ाई में बाधा डाले या बिना अनुमति वीडियो बनाकर उसे सोशल मीडिया पर डाल दे, तो इससे बच्चों की निजता और सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। यह चिंता अपनी जगह सही है। बच्चों की तस्वीरें और वीडियो उनकी अनुमति, सम्मान और सुरक्षा का ध्यान रखे बिना सार्वजनिक नहीं किए जाने चाहिए। स्कूल में अनजान लोगों की आवाजाही पर नियंत्रण भी जरूरी है।

लेकिन यहां एक सवाल उठता है। क्या बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए नियम इस तरह लागू किए जा सकते हैं कि स्कूलों की हालत देखने और उनकी कमियां सामने लाने में भी मुश्किल होने लगे?

सरकारी स्कूलों की हालत पर सवाल क्यों उठते हैं?

भारत के सरकारी स्कूलों की स्थिति हर जगह एक जैसी नहीं है। कई स्कूलों में अच्छी सुविधाएं हैं, तो कई जगह जर्जर इमारतें, टूटी कक्षाएं, बैठने की कमी और शिक्षकों की कमी जैसी समस्याएं सामने आती हैं। कई जगह स्कूलों की इमारतों या कमरों का इस्तेमाल पशुओं को बांधने के लिए किए जाने जैसी शिकायतें और तस्वीरें भी सामने आती रही हैं। आखिर सरकारी स्कूलों का पैसा जनता के टैक्स से आता है। वहां पढ़ने वाले बच्चों को सुरक्षित इमारत, योग्य शिक्षक, साफ पानी, शौचालय और सम्मानजनक माहौल मिलना चाहिए। अगर इन सुविधाओं में कमी है, तो उसे सामने लाना शिक्षा व्यवस्था को सुधारने का एक तरीका हो सकता है।

मिड-डे मील में गड़बड़ी की खबरें भी चिंता बढ़ाती हैं

सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील यानी पीएम पोषण योजना का भोजन कई बच्चों के लिए पौष्टिक आहार का अहम हिस्सा है। इसलिए इसकी गुणवत्ता और मात्रा में गड़बड़ी गंभीर मामला है। अलग-अलग जगहों से खाने में कीड़े या छिपकली मिलने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं, जिनकी जांच जरूरी है। फरवरी 2026 में उत्तर प्रदेश के महोबा में करीब 50 बच्चों को पानी मिलाकर पतला किया गया दूध देने का वीडियो सामने आया था। इससे पहले नवंबर 2019 में सोनभद्र में एक लीटर दूध में पानी मिलाकर 81 बच्चों को देने का मामला सामने आया था। ये घटनाएं बताती हैं कि बच्चों की सुरक्षा केवल स्कूल में प्रवेश तक सीमित नहीं है। उन्हें कैसा भोजन मिल रहा है, स्कूल की इमारत कैसी है और शिक्षक पर्याप्त हैं या नहीं—ये भी अहम सवाल हैं। अगर कोई वीडियो गड़बड़ी सामने लाता है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। सिर्फ वीडियो बनाने से रोकने पर गड़बड़ी दूर नहीं होती।

देशभर में स्कूलों की सुविधाएं और शिक्षकों की स्थिति क्या है?

शिक्षा मंत्रालय की UDISE+ 2024–25 रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 1,04,125 स्कूल ऐसे थे, जहां सिर्फ एक शिक्षक था, जबकि 7,993 स्कूलों में एक भी विद्यार्थी नामांकित नहीं था। रिपोर्ट के अनुसार, देश के सभी प्रबंधन वाले स्कूलों में 64.7% में कंप्यूटर, 63.5% में इंटरनेट और 54.9% में दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए रैंप व हैंडरेल की सुविधा दर्ज की गई। ये आंकड़े सरकारी और निजी, दोनों तरह के स्कूलों के हैं।

ये राष्ट्रीय आंकड़े हैं, इसलिए हर राज्य या स्कूल की स्थिति एक जैसी नहीं मानी जा सकती। लेकिन ये देश में शिक्षकों की उपलब्धता और स्कूलों में जरूरी सुविधाओं की पहुंच से जुड़े सवाल जरूर सामने रखते हैं।

कांग्रेस ने गुजरात सरकार पर क्या आरोप लगाए?

गुजरात में नए नियमों पर कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार स्कूलों की कमियां छिपाना चाहती है। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष दोशी के मुताबिक, राज्य में करीब 40 हजार शिक्षक पद खाली हैं, 42 हजार कक्षाएं खराब हालत में हैं और 3 हजार स्कूल एक ही शिक्षक के भरोसे हैं।

कांग्रेस ने शिक्षकों की नियुक्ति और स्कूलों की मरम्मत पर जोर दिया। वहीं, भाजपा प्रवक्ता डॉ. अनिल पटेल ने नियमों का बचाव करते हुए कहा कि स्कूलों में भीड़ और वीडियो बनाने से बच्चों में डर पैदा होता है और उनकी निजता प्रभावित होती है।

यानी सरकार बच्चों की सुरक्षा की बात कर रही है, जबकि विपक्ष स्कूलों की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठा रहा है।

राजस्थान में भी उठ चुका है ऐसा विवाद

गुजरात से पहले राजस्थान में भी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश और बिना अनुमति फोटो-वीडियो बनाने पर विवाद हुआ था। अगस्त 2026 में सरकार ने इस संबंध में निर्देश जारी किए। यह घटनाक्रम CJP के ‘School Thik Karo’ अभियान की घोषणा के बाद सामने आया, जिसका उद्देश्य सरकारी स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं की कमियों को सामने लाना था।

सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान और उत्तर प्रदेश के नियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि अदालत ने इन नियमों को सही ठहराया या उनकी संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला दिया।

पश्चिम बंगाल में स्कूल देखने पहुंचे युवक के परिवार पर हमला

इसी अभियान के दौरान पश्चिम बंगाल में CJP से जुड़े 25 वर्षीय शेख अब्दुल हाफिज 13 अगस्त 2026 को बांंकुड़ा जिले के करिसुंडा गांव के सरकारी स्कूल में बुनियादी सुविधाएं देखने पहुंचे थे। द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ घंटे बाद उनके परिवार पर घर में हमला हुआ। उनके पिता शेख मोहम्मद मफिक की 15 अगस्त को चोटों के कारण मौत हो गई। मामले में भाजपा के एक नेता समेत आठ लोगों की गिरफ्तारी की खबर आई। हालांकि, घटनाओं के समय के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हमला स्कूल का जायजा लेने के कारण हुआ। इसकी वजह जांच और सबूतों से ही तय हो सकती है।

यह घटना सवाल उठाती है कि सरकारी स्कूलों की कमियां सामने लाने वालों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए?

क्या POCSO जैसे कानूनों के तहत भी कार्रवाई हो सकती है?

गुजरात के शिक्षा मंत्री प्रद्युम्न वाजा ने नियमों के उल्लंघन पर POCSO, किशोर न्याय अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता के तहत कार्रवाई की बात कही है। लेकिन सवाल है कि आखिर ऐसी कौन-सी घटनाएं सामने आईं, जिनके चलते सरकार को निजता के अधिकार और POCSO जैसे कानूनों का जिक्र करना पड़ा? क्या स्कूलों में बच्चों की निजता का वास्तव में उल्लंघन हो रहा है? क्या ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनसे इन सख्त नियमों की जरूरत पड़ी? या इन प्रावधानों के जिक्र से लोगों में डर पैदा हो सकता है? इन सवालों का जवाब देने के लिए सरकार को नियमों के पीछे की ठोस वजह और ऐसे मामलों के आंकड़े भी सार्वजनिक करने चाहिए। 

सुरक्षा के साथ पारदर्शिता कैसे?

बच्चों की सुरक्षा के लिए स्कूलों में बाहरी लोगों की आवाजाही और फोटो-वीडियो पर नियम जरूरी हो सकते हैं। लेकिन जर्जर इमारतों, शिक्षकों की कमी और मिड-डे मील में गड़बड़ी जैसी शिकायतों की जांच भी जरूरी है। इसके लिए अभिभावकों के स्कूल आने, पत्रकारों के निरीक्षण और शिकायतों की जांच की स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि बच्चों की निजता सुरक्षित रहे और स्कूलों की कमियां भी सामने आ सकें।

सवाल स्कूल के दरवाजे का नहीं, जवाबदेही का है

गुजरात सरकार नए नियमों को बच्चों की सुरक्षा और निजता से जोड़ रही है, जबकि विपक्ष का आरोप है कि इससे सरकारी स्कूलों की कमियां सामने लाना मुश्किल होगा। इन दावों की असल तस्वीर नियमों के इस्तेमाल और स्कूलों की स्थिति से सामने आएगी। बच्चों की निजता का उल्लंघन हो तो कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन अभिभावकों की शिकायतों और स्कूलों की बदहाली की जांच का रास्ता भी खुला रहना चाहिए। क्योंकि स्कूलों की कमियां सामने आने से बच्चों का नुकसान नहीं, बल्कि उन्हें बेहतर शिक्षा, सुरक्षित इमारत और अच्छा भोजन दिलाने में मदद मिल सकती है।

बच्चों की निजता की रक्षा जरूरी है, लेकिन स्कूलों की कमियों पर पर्दा नहीं। सवाल है कि सरकार इन दोनों के बीच संतुलन बनाते हुए स्कूलों की जवाबदेही कैसे सुनिश्चित करेगी?