दिल्ली में एनएसयूआई के हालिया प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई और उसके बाद एफआईआर दर्ज कराने को लेकर उपजा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। 13 अक्टूबर को चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान एनएसयूआई की राष्ट्रीय राष्ट्रीय सचिव ऋतु बराला और छात्र नेता अथरा विजयन के साथ कथित तौर पर पुलिसकर्मियों द्वारा मारपीट का मामला सामने आया था। वायरल वीडियो में महिला पुलिसकर्मियों द्वारा दुर्व्यवहार और गर्दन दबाए जाने के दृश्य कैद हुए थे।
हालांकि, जब पीड़ितों ने न्याय के लिए दिल्ली में एफआईआर दर्ज कराने की कोशिश की, तो पुलिस ने गंभीर लापरवाही बरती। ऋतु बराला की शिकायत को अलग से दर्ज करने के बजाय एक पुरानी एफआईआर (नंबर 291/2026) में जोड़ दिया गया, जिसमें खुद ऋतु को ही आरोपी बना दिया गया। वहीं, अथरा विजयन की शिकायत लेने से ही इंकार कर दिया गया। जब दिल्ली में न्याय नहीं मिला, तो कांग्रेस नेताओं की पहल पर यह मामला जयपुर तक पहुंचा, जहां राजस्थान पुलिस कमिश्नरेट के बाहर भी भारी विरोध प्रदर्शन और धरने के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं की गई। हालांकि, अथरा विजयन की शिकायत बाद में केरल के तिरुवनंतपुरम में जरूर दर्ज कर ली गई।
यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले नीट पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान पैट गन लगने से घायल हुए साहिल लोचब को भी एफआईआर के लिए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के साथ पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने के बाहर 6 घंटे धरना देना पड़ा था।
इसके विपरीत, दिल्ली पुलिस के दूसरे चेहरे पर भी सवाल उठ रहे हैं। जब 6 अक्टूबर को विपक्ष ने संसद से चुनाव आयोग तक मार्च निकाला और राहुल गांधी सरकारी बिल्डिंग के परिसर में दाखिल हुए, तो पुलिस ने तुरंत रातोंरात और अगले दिन ताबड़तोड़ दो एफआईआर दर्ज कर लीं। इन दोहरे मानकों ने पुलिस की कार्यप्रणाली और कानून के सबके लिए एक समान होने के दावे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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