“ASEAN Summit” में वर्चुअल भागीदारी-मोदी का फैसला और विरोध कांग्रेस का
प्रधानमंत्री ने ट्वीट कर कहा कि उन्होंने Kuala Lumpur में आयोजित ASEAN-India सत्र में वर्चुअल हिस्सा लेने की जानकारी मलयेशिया के प्रधानमंत्री Anwar Ibrahim को दी है।
इसके पीछे सरकार की ओर से बताया गया कि कार्यक्रम और उत्सवों के कारण यात्रा संभव नहीं थी।
हालांकि, कांग्रेस ने इस फैसले को देश की प्रतिष्ठा और विदेश नीति के नजरिए से चिंताजनक बताया है। कांग्रेस के महासचिव (संचार) Jairam Ramesh ने सोशल मीडिया पर लिखा कि प्रधानमंत्री ट्रम्प से खुलकर नहीं मिलना चाहते क्योंकि इससे कुछ सवाल खड़े हो सकते हैं।
उन्होंने कहा:
“अब यह लगभग तय हो गया है कि प्रधानमंत्री वहाँ नहीं जाएंगे… इसका मतलब है कि कई विश्व नेताओं से गले मिलने, फोटो खिंचवाने और ख़ुद को विश्वगुरु बताने के कई मौके हाथ से निकल गए।”
वे आगे बोले कि ट्रम्प ने कई बार दावा किया है कि उन्होंने “ऑपरेशन सिंदूर” को रोका तथा भारत ने रूस से तेल आयात बंद करने का वादा किया—ऐसे में मोदी-ट्रम्प आमने-सामने आने से बचते दिख रहे हैं।
“ASEAN Summit” और अमेरिका-भारत व्यापार: ट्रम्प से मुलाकात क्यों बनी मुद्दा
ASEAN-समूह के सम्मेलन में इस बार अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प के शामिल होने की संभावना को भी देखा जा रहा था। भाजपा सरकार ने व्यापार एवं सुरक्षा सहयोग को राज्य प्राथमिकता के रूप में बताया है, विशेषकर Association of Southeast Asian Nations (ASEAN) समूह के साथ भारत के संबंधों को रणनीतिक बताया गया है।
लेकिन कांग्रेस का कहना है कि मोदी-सरकार इस अवसर को छोड़ रही है सिर्फ इसलिए कि ट्रम्प के साथ सार्वजनिक तस्वीरें या किसी संघर्षविहीन संवाद का सामना करना कठिन हो सकता है। कांग्रेस ने यह भी याद दिलाया कि मोदी ने कुछ समय पहले Gaza Peace Summit भी नहीं जाए थे—उसी कथित वजह से।
इस फैसले के पीछे व्यावहारिक कारण भी सामने आए हैं: यात्रा-समय, कार्यक्रम-तालमेल और त्योहार-कार्यों जैसे। लेकिन राजनीतिक आलोचना ने इसे विदेश नीति का संकेत-चिन्ह माना है कि भारत महत्वपूर्ण बहुपक्षीय मंच पर व्यक्तिगत उपस्थिति क्यों नहीं देना चाहता।
“ASEAN Summit” के माध्यम से राजनीति-रणनीति: कांग्रेस का बयान और सरकार की प्रतिक्रिया
कांग्रेस के आरोपों पर सरकार की प्रतिक्रिया धीरे-धीरे सामने आ रही है। विदेश मंत्रालय और भारतीय प्रतिनिधि सूत्रों ने माना है कि आयोजन में व्यक्तिगत रूप से शामिल न होने का कारण ‘कार्यक्रम एवं अन्य प्रतिबद्धताएँ’ हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि भारत-अमेरिका संबंधों में व्यापार, सुरक्षा और ऊर्जा जैसे आयामों पर अभी गहन संवाद चल रहा है। इस संदर्भ में, ASEAN मंच पर प्रधानमंत्री की उपस्थिति या अनुपस्थिति को कुछ लोग रणनीतिक-चाल के रूप में देख रहे हैं। ASEAN क्षेत्र में भारत की “एक्ट ईस्ट नीति” का महत्व लगातार बढ़ा है, इसलिए ऐसे अवसर को छोड़ना तत्कालीन नेतृत्व पर सवाल खड़ा करता है।
कांग्रेस ने इस विषय को राजनीतिक-रणनीतिक दोनों रूपों से उठाया है:
- “ASEAN Summit” में मोदी का ना जाना = विदेश नीति में ‘हिचक’।
- ट्रम्प के साथ तस्वीरें या संवाद से बचना = बिलकुल सार्वजनिक/दृश्यमान राजनीति से हटने का संकेत।
सरकार के लिए इस तरह के दावे चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं क्योंकि वे प्रतिद्वंद्वी को इस तरह की छवि देते हैं कि देश महत्वपूर्ण वैश्विक मंचों पर सक्रिय नेतृत्व नहीं दिखा रहा। दूसरी ओर, सरकार यह तर्क देती है कि विदेश नीति मात्र सार्वजनिक छवि बनाने का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित-आधारित निर्णयों का समूह है।





