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प्रधानमंत्री मोदी ने असम में भारत का पहला बांस-आधारित एथेनॉल संयंत्र किया उद्घाटन: हरित ऊर्जा की दिशा में एक बड़ा कदम

जब प्रधानमंत्री मोदी ने असम में भारत का पहला बांस-आधारित एथेनॉल संयंत्र किया उद्घाटन, तो उन्होंने इसे एक पर्यावरणीय प्रयास बताया। इस पौधे की खासियत यह है |

प्रधानमंत्री मोदी ने असम में भारत का पहला बांस-आधारित एथेनॉल संयंत्र किया उद्घाटन: हरित ऊर्जा की दिशा में एक बड़ा कदम
फोटो: प्रधानमंत्री मोदी ने असम में भारत का पहला बांस-आधारित एथेनॉल संयंत्र किया उद्घाटन: हरित ऊर्जा की दिशा में एक बड़ा कदम

बांस से ईथेनॉल: नई टेक्नोलॉजी और पर्यावरण हित


जब प्रधानमंत्री मोदी ने असम में भारत का पहला बांस-आधारित एथेनॉल संयंत्र किया उद्घाटन, तो उन्होंने इसे एक पर्यावरणीय प्रयास बताया। इस पौधे की खासियत यह है कि यह “दूसरी पीढ़ी” (2G) की ईथेनॉल तकनीक का उपयोग करता है, जिसमें बांस जैसी लकड़‑पूँजी (biomass) काम में आती है।

इस प्लांट की स्थापना Numaligarh, Golaghat ज़िले में हुई है, और इसमें लगभग ₹5,000 करोड़ का निवेश किया गया है। इसकी क्षमता है लगभग 48,900 मीट्रिक टन ईथेनॉल प्रति वर्ष उत्पादन की, और इसके साथ ही कुछ सह‑उत्पाद जैसे कि फ्यूरफ्यूरल, एसिटिक एसिड, और खाद्य ग्रेड CO₂ भी तैयार होंगी।

पर्यावरण हेतु इसका एक बड़ा फ़ायदा है कि यह जीरो‑वेस्ट प्लांट है। प्लांट में बांस का हर हिस्सा उपयोग किया जाएगा, बचा हुआ हिस्सा ऊर्जा उत्पादन के लिए काम आएगा। इससे प्रदूषण कम होगा और जंगलों पर दबाव भी घटेगा।

किसानों, रोजगार और पूर्वोत्तर की समृद्धि की संभावनाएँ


प्रधानमंत्री मोदी ने असम में भारत का पहला बांस-आधारित एथेनॉल संयंत्र किया उद्घाटन से स्थानीय किसानों के जीवन में आने वाली संभावनाएँ बहुत बड़ी हैं। क्योंकि इस प्लांट को चलाने के लिए बांस चाहिए, और इस बांस की खेती पूर्वोत्तर के कई क्षेत्रों में हो सकती है। राज्य सरकार व केंद्र सरकार मिलकर किसानों को बांस की खेती और उसकी आपूर्ति में समर्थन करेंगे।

यह परियोजना कृषि‑आधारित लोगों और ग्रामीण इलाकों के लिए रोजगार के नए अवसर लाएगी। बांस की कटाई, परिवहन, प्लांट तक पहुँच, सहायक उद्योगों की स्थापना आदि से लोगों को नियमित आय होने की संभावना है। इसके अतिरिक्त, प्रधानमंत्री मोदी ने असम में भारत का पहला बांस-आधारित एथेनॉल संयंत्र किया उद्घाटन ईथेनॉल ब्लेंडिंग नीति (E20 ब्लेंडिंग) को मजबूत करेगी, क्योंकि देश को ईंधनों में मिश्रण बढ़ाने की ज़रूरत है जिससे तेल‑आयात पर निर्भरता कम हो।

पूर्वोत्तर में विकास की आम धारणा यही थी कि संसाधन होते हुए भी निवेश कम आता है; लेकिन इस तरह की बड़ी परियोजनाएँ न केवल निवेश लाती हैं बल्कि बुनियादी ढाँचे, सड़कों, परिवहन व्यवस्था, जन स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में भी सुधार की राह खोलती हैं।

चुनौतियाँ और आगे की राह


हालाँकि प्रधानमंत्री मोदी ने असम में भारत का पहला बांस-आधारित एथेनॉल संयंत्र किया उद्घाटन एक बहुत बड़ा कदम है, लेकिन कुछ चुनौतियाँ भी सामने हैं जिन्हें हल करना ज़रूरी है:

  • कच्चे माल की स्थिर आपूर्ति: बांस की खेती मौजूदा समय में पर्याप्त हो रही है, लेकिन यदि हेतु योजना, किसान प्रशिक्षण और संसाधन नहीं मिलेंगे, तो आपूर्ति स्थिर नहीं होगी।

  • लॉजिस्टिक्स और बुनियादी ढाँचा: बांस को खेतों से प्लांट तक लाना, स्टोरेज की व्यवस्था, प्रसंस्करण के लिए सही तकनीक, ये सब सही तरीके से काम करने चाहिए।

  • पर्यावरणीय प्रबंधन: जंगलों से बांस अवैध कटाई न हो, भूमि की सेहत बनी रहे, जैव विविधता सुरक्षित रहे — ये देखना होगा।

  • नियंत्रण और मूल्य निर्धारण: ईथेनॉल के दाम, सह‑उत्पादों के दाम, किसानों को मिलने वाला मुनाफा, सरकार के नियम — ये सब पारदर्शी और न्यायसंगत होने चाहिए।