कोर्ट का सवाल और चुनाव याचिकाएं
मद्रास हाई कोर्ट ने बुधवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की पेरंबूर विधानसभा सीट से मिली चुनावी जीत को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया कि क्या एक चार्टर्ड अकाउंटेंट की गलती के कारण संपत्ति के ब्योरे में हुई चूक के आधार पर विजय की जीत को रद्द किया जा सकता है। विजय ने इस सीट से 53,715 वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी, लेकिन अब उनकी इस जीत को चुनौती देने के लिए तीन अलग-अलग चुनाव याचिकाएं दायर की गई हैं।
इसके साथ ही, त्रिची ईस्ट सीट से मिली विजय की जीत पर भी एक याचिका दायर की गई है, जिसमें उन्होंने 27,416 वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी। विजय ने बाद में त्रिची ईस्ट सीट छोड़कर पेरंबूर सीट को अपने पास रखा, जिससे कुल चार याचिकाएं उनके चुनावी परिणाम से संबंधित हैं।
न्यायमूर्ति का टिप्पणी
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मणन कर रहे थे, जिन्होंने विजय की ओर से दायर याचिका पर विचार किया। इस याचिका में चारों चुनाव याचिकाओं को खारिज करने की मांग की गई है। सुनवाई के दौरान, न्यायाधीश ने यह टिप्पणी की कि जब उम्मीदवार ने 600 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति का खुलासा किया है, तो महज 30 करोड़ रुपये की संपत्ति छूटने के आधार पर उनकी जीत को अवैध ठहराना कैसे संभव है। इस प्रश्न ने पूरे मामले की दिशा को प्रभावित करने की संभावना जताई है।
याचिका में आरोप और मुख्यमंत्री का पक्ष
पेरंबूर सीट से जुड़ी याचिका एस. दिनेश ने दायर की है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि विजय ने अपने नामांकन पत्र और हलफनामे में लगभग 30 करोड़ रुपये की संपत्ति की जानकारी छिपाई या गलत तरीके से दी। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में तीन संपत्तियों का उल्लेख किया है, जिनमें से एक पानरुटी में लगभग 30 करोड़ रुपये की संपत्ति है। याचिका में कहा गया है कि संपत्तियों का सही विवरण नहीं देना जन प्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन है, और इसी आधार पर चुनाव रद्द किया जाना चाहिए।
वहीं, मुख्यमंत्री विजय की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने इन आरोपों का विरोध करते हुए कहा कि यह केवल चार्टर्ड अकाउंटेंट की छोटी गलतियां हैं, जो जानबूझकर जानकारी छिपाने के अंतर्गत नहीं आतीं। उन्होंने अदालत से कहा कि उम्मीदवार ने अपनी संपत्ति का लगभग 99 प्रतिशत सही तरीके से प्रस्तुत किया है, और छोटी चूक से चुनाव परिणाम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
सुनवाई का अगला चरण
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलीलें पूरी नहीं हो सकीं, जिसके चलते अदालत ने मामले की अगली सुनवाई गुरुवार के लिए तय की है। कोर्ट अब यह तय करेगा कि याचिकाओं में उठाए गए आरोप कितने गंभीर हैं और क्या उन्हें प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज किया जा सकता है।
गौरतलब है कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 86 के तहत चुनाव याचिकाओं का निपटारा छह महीने के भीतर आवश्यक है। इसलिए अदालत से उम्मीद की जा रही है कि वह इस मामले में शीघ्र निर्णय देगी।





