कर्नाटक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान नाम हटाने की प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं। द हिंदू की 26 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव अधिकारियों ने 61 हजार से अधिक फॉर्म-7 आवेदन दाखिल किए, लेकिन इनमें नाम हटाने का कारण दर्ज नहीं था। इनमें से 60,800 से अधिक आवेदन दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की निर्धारित समयसीमा समाप्त होने के बाद दाखिल किए गए। रिपोर्ट में जांचे गए मामलों में संबंधित मतदाताओं के नाम पहले ही सूची से हटाए जा चुके थे।
आवेदनों में कारण दर्ज नहीं
फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में किसी नाम को शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराने या नाम हटाने का अनुरोध करने के लिए किया जाता है। किसी मतदाता की मृत्यु, स्थायी रूप से दूसरी जगह चले जाने या एक से अधिक स्थानों पर नाम दर्ज होने जैसी परिस्थितियों में इसका इस्तेमाल हो सकता है। हालांकि, आवेदन दाखिल होना अपने आप में नाम हटाने का पर्याप्त आधार नहीं है। संबंधित जानकारी की जांच और निर्धारित प्रक्रिया का पालन भी जरूरी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक में दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की अवधि 24 अगस्त से 23 सितंबर 2026 तक थी। इस दौरान चुनाव अधिकारियों की ओर से केवल 192 फॉर्म-7 आवेदन दाखिल हुए। इसके बाद 24 सितंबर से 22 अक्टूबर के बीच 60,800 से अधिक आवेदन जमा किए गए। अकेले 17 अक्टूबर को 11,132, 19 अक्टूबर को 11,760, 21 अक्टूबर को 10,314 और 22 अक्टूबर को 10,105 आवेदन दाखिल हुए।
अधिकारियों ने क्या सफाई दी?
चुनाव पंजीकरण अधिकारियों (ERO) और सहायक चुनाव पंजीकरण अधिकारियों (AERO) के अनुसार, ये फॉर्म सॉफ्टवेयर के जरिए स्वतः तैयार हुए थे। अधिकारियों ने बताया कि कुछ मतदाताओं के रिकॉर्ड का मिलान नहीं हो पाया या जानकारी में विसंगतियां थीं। संबंधित लोगों को नोटिस दिए गए, लेकिन सुनवाई के दौरान संपर्क नहीं हो पाने पर उन्हें पात्र नहीं माना गया। इसके बाद डिजिटल हस्ताक्षर के साथ फॉर्म तैयार किए गए। अधिकारियों का कहना था कि सॉफ्टवेयर के कारण नाम हटाने की वजह वाला कॉलम खाली रह गया।
कई विधानसभा क्षेत्रों में बड़ी संख्या
रिपोर्ट के अनुसार, बीबीएमपी के दक्षिण जिले में 17,491 फॉर्म-7 आवेदन दाखिल हुए, जिनमें 10,374 अधिकारियों की ओर से थे। बोम्मनहल्ली विधानसभा क्षेत्र में 5,757 आवेदनों में से 495 अधिकारियों ने दाखिल किए। कर्नाटक के कम से कम 26 विधानसभा क्षेत्रों में अधिकारियों की ओर से दाखिल आवेदन मतदाताओं या तीसरे पक्षों के आवेदनों से अधिक थे।
SIR की शुरुआती गणना के बाद मसौदा मतदाता सूची से एक करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने की भी रिपोर्ट में चर्चा है। इनमें दूसरी जगह जा चुके, पते पर नहीं मिले, मृत और अन्य श्रेणियों के मतदाता शामिल थे। हालांकि, शुरुआती सूची से नाम हटाना और बाद में फॉर्म-7 के जरिए आपत्ति दर्ज करना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल
अखबार ने निर्वाचन आयोग के पोर्टल पर कुछ मतदाताओं के रिकॉर्ड की जांच की और पाया कि संबंधित नाम हटाए जा चुके थे। यह नमूना जांच अपने आप में यह साबित नहीं करती कि सभी आवेदन गलत थे या हर मामले में नियमों का उल्लंघन हुआ। फिर भी, आवेदन में कारण दर्ज न होना और बड़ी संख्या में आवेदन समयसीमा के बाद दाखिल होना प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है।
अब यह स्पष्ट होना जरूरी है कि सॉफ्टवेयर ने किन आधारों पर आवेदन तैयार किए, रिकॉर्ड की जांच कैसे हुई और नाम हटाने का अंतिम फैसला किस जानकारी के आधार पर लिया गया। मतदाता सूची में नाम होना मतदान के अधिकार से जुड़ा है, इसलिए हर कार्रवाई में पारदर्शिता, उचित जांच और नियमों का पालन महत्वपूर्ण है।





