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डॉलर के सामने भारतीय रुपया 90 के करीब, क्या है गिरावट की असली वजह?

भारत की तेज़ रफ्तार GDP ग्रोथ भी रूपये को संभाल नहीं पाई। कमज़ोर पूंजी प्रवाह, बढ़ते अमेरिकी शुल्क डॉलर की भारी डिमांड ने भारतीय मुद्रा को 90 के पार धकेल दिया..

डॉलर के सामने भारतीय रुपया 90 के करीब, क्या है गिरावट की असली वजह?
फोटो: Indian Rupee near 90, GDP
भारत आज दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, पर फिर भी भारतीय रुपया बुधवार को 90 के करीब पहुंच गया। इससे पहले मंगलवार को रुपया 89.94 के अपने रिकॉर्ड निचले स्तर को तोड़ते हुए 90.14 प्रति डॉलर तक पहुंच गया जो अब इसकी छठी सबसे बड़ी गिरावट के रूप में दर्ज हो रही है।

ये सिर्फ एक आंकड़ा नहीं ये संकेत है कि घरेलू इकोनॉमी की चमक और ज़मीनी हकीकत में फर्क बढ़ रहा है। GDP ग्रोथ उम्मीद से बेहतर रही है, लेकिन अमेरिका के दंडात्मक शुल्क और कमज़ोर पूंजी प्रवाह रुपये पर दबाव बनाए हुए हैं।

रायटर्स की रिपोर्ट तो और भी चौंकाने वाली है। उनके मुताबिक, इस साल एशियाई मुद्राओं में रुपये की 5% गिरावट हुई है मतलब 2022 के बाद रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर सबसे खराब साल बनने की तरफ बढ़ रहा है।

“बिना ट्रेड डील, यही होगा” ANZ का साफ कहना


ANZ के FX स्ट्रैटेजिस्ट धीरज नीम का कहना है: जब तक कोई व्यापार समझौता नहीं होता, भारत को ऐसे ही आर्थिक समायोजन से गुजरना पड़ेगा। ANZ ने अंदाज़ा लगाया है कि अमेरिकी शुल्कों के दबाव में अगले साल तक रुपया 91.30 तक जा सकता है।

 उनका ये भी कहना है कि RBI इस बार जोरदार दखल देने की जगह सिर्फ छोटे-छोटे हस्तक्षेप कर रहा है, ताकि बाजार पूरी तरह RBI पर निर्भर न हो जाए।

डॉलर की मांग कहानी की असली कुंजी


मनीकंट्रोल के मुताबिक, फिनरेक्स ट्रेज़री के अनिल कुमार भंसाली बताते हैं कि RBI ज़रूरत पड़ने पर डॉलर बेचकर रुपये को संभाल रहा है। लेकिन दिलचस्प ये है कि जब रुपया थोड़ा मजबूत होता है, तो RBI खुद ही डॉलर खरीद लेता है ताकि बाजार में डॉलर की मांग बनी रहे। मतलब खेल सिर्फ रुपये का नहीं, डॉलर की बढ़ती भूख का भी है। इसलिए भारतीय रुपया 90 के करीब दर्ज किया गया लेकिन बाजार में जीडीपी की दशा में सुधार देखा गया है।

रुपया कमजोर दिख रहा है, पर इकोनॉमी टाइट है- RBI


RBI ने साफ कहा है कि भारत की इकोनॉमी काफी मजबूत है, 8.2% की तगड़ी GDP ग्रोथ इसी बात का सबूत है। लेकिन बाज़ार में डॉलर की इतनी ज़्यादा डिमांड है कि रुपये की हालत कमज़ोर नज़र आ रही है। सिंपल भाषा में इकोनॉमी ठीक है, पर ग्लोबल दबाव भारी है।

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