अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, लेकिन शेयर बाज़ार, रुपया और आम निवेशक की चिंता क्यों बढ़ रही है? देश की अर्थव्यवस्था 7.8% की दर से बढ़ रही है। सरकार इस आंकड़े को भारतीय अर्थव्यवस्था की मज़बूती के तौर पर पेश कर रही है। लेकिन दूसरी तरफ विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाज़ार से पैसा निकाल रहे हैं, रुपया डॉलर के मुकाबले कमज़ोर हो रहा है और आम निवेशक के पोर्टफोलियो में लगातार लाल निशान दिखाई दे रहे हैं।
2026 में अब तक Foreign Portfolio Investors यानी FPI भारतीय शेयर बाज़ार से करीब ₹2.31 लाख करोड़ निकाल चुके हैं। डॉलर की कीमत ₹95-96 के आसपास पहुँच गई है। 2025 से 2026 के बीच रुपया लगभग 11% कमज़ोर हुआ है और इस साल जनवरी से अगस्त तक भी इसमें करीब 7% की गिरावट आई है।
शेयर बाज़ार का प्रदर्शन भी सवाल खड़े कर रहा है। Sensex और Nifty में उतार-चढ़ाव के बीच निवेशकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर भारत की अर्थव्यवस्था इतनी तेज़ी से बढ़ रही है, तो बाज़ार में वह विश्वास क्यों दिखाई नहीं दे रहा? यहीं से असली कहानी शुरू होती है।
GDP बढ़ रही है, फिर निवेशक क्यों बेच रहे हैं?
सबसे पहले एक बुनियादी बात समझना ज़रूरी है। GDP और Stock Market एक ही चीज़ नहीं हैं। GDP बताती है कि देश में कुल आर्थिक गतिविधि कितनी बढ़ी। शेयर बाज़ार यह बताता है कि निवेशकों को लिस्टेड कंपनियों की आय, मूल्यांकन, ब्याज दर, वैश्विक स्थितियों और मुनाफे को लेकर क्या उम्मीद है। इसलिए GDP 7.8% बढ़ सकती है और उसी समय शेयर बाज़ार गिर भी सकता है।
लेकिन जब GDP वृद्धि के साथ विदेशी निवेशकों की बड़ी बिकवाली, कमज़ोर रुपया और कमज़ोर उपभोग जैसे संकेत भी दिखाई दें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि वृद्धि का फायदा आखिरकार किसे मिल रहा है?
राहुल गांधी ने जून में चेतावनी दी, अगस्त में मोदी ने दी बधाई
जून 2026 में राहुल गांधी आर्थिक संकट को लेकर चेतावनी दे रहे थे। उन्होंने अर्थव्यवस्था की स्थिति पर सवाल उठाते हुए आर्थिक संकट की आशंका जताई। इसके करीब दो महीने बाद, 31 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से देश को तेज़ आर्थिक वृद्धि के लिए बधाई दी गई। और फिर सितंबर के अंत में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े खतरों की चर्चा की।
यानी एक तरफ सरकार विकास की तस्वीर दिखा रही है, दूसरी तरफ आर्थिक संकटों की चर्चा भी सामने आ रही है। तो आखिरकार वास्तविक तस्वीर क्या है?
7.8% GDP का मतलब क्या है?
किसी भी देश में GDP बढ़ने का सामान्य अर्थ है कि अर्थव्यवस्था में उत्पादन और आर्थिक गतिविधि बढ़ रही है। सैद्धांतिक तौर पर अगर कंपनियां ज़्यादा सामान और सेवाएं बेचती हैं, तो उनका राजस्व बढ़ सकता है। राजस्व बढ़ेगा तो मुनाफा बढ़ने की संभावना होती है और मुनाफा बढ़ने की उम्मीद स्टॉक कीमतों को बढ़ा सकती है।
लेकिन यह कोई automatic rule नहीं है। यह भी एक सच है कि स्टॉक माकेर्ट आज की अर्थव्यवस्था से ज़्यादा कल की अर्थव्यवस्था की उम्मीदों पर चलता है। अगर निवेशकों को लगता है कि आने वाले समय में कॉरपोरेट कमाई कमज़ोर होगी, वैल्युएशन बहुत ज़्यादा हैं, क्रूड महंगा होगा, ब्याज दरें ऊँची रहेंगी या वैश्विक अनिश्चितता बढ़ेगी, तो वे GDP वृद्धि के बावजूद शेयर्स बेच सकते हैं।
लेकिन यह एक महत्वपूर्ण सवाल ज़रूर पैदा करता है। क्या हेडलाइन GDP वृद्धि आम भारतीय की आर्थिक स्थिति को पूरी तरह दिखा पा रही है?
Nifty और Sensex आखिरकार बताते क्या हैं?
निफ्टी50 NSE का प्रमुख सूचकांक है। इसमें NSE पर सूचीबद्ध बड़ी कंपनियों में से 50 प्रमुख कंपनियां शामिल हैं। सेंसेक्स BSE का प्रमुख सूचकांक है और इसमें 30 बड़ी कंपनियां शामिल हैं। इन कंपनियों में बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं, सूचना एवं प्रौद्योगिकी, ऑटोमोबाइल, ऊर्जा, दवाएं, टेलीकॉम, उपभोक्ता वस्तुएं और दूसरे महत्वपूर्ण सेक्टर शामिल हैं। लंबे समय तक बाज़ार कमज़ोर रहने पर सवाल ज़रूर उठते हैं।
क्या यह K-Shaped Recovery है?
यहीं पर "K-Shaped Recovery" की बहस सामने आती है। K अक्षर की तरह रिकवरी की एक रेखा ऊपर जाती है और दूसरी नीचे। ऊपर जाती हुई रेखा अर्थव्यवस्था के उन हिस्सों को दिखाती है जिन्हें वृद्धि का ज़्यादा लाभ मिल रहा है—जैसे बड़े कॉरपोरेट्स, उच्च आय वाले उपभोक्ता और कुछ तेज़ी से बढ़ते सेक्टर्स।
दूसरी तरफ नीचे जाती हुई रेखा उन लोगों और सेक्टर्स को दिखाती है जो वृद्धि का लाभ समान रूप से हासिल नहीं कर पा रहे—जैसे छोटे कारोबार, असंगठित क्षेत्र और निम्न आय वाले उपभोक्ता। इसलिए असली सवाल यह है कि वृद्धि कितनी है, यह महत्वपूर्ण है; लेकिन विकास किसके लिए है, यह उससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है।
क्या GDP के आंकड़ों में "हेरफेर" हो रहा है?
यह सबसे संवेदनशील सवाल है। क्या 7.8% की GDP growth वास्तव में उतनी ही है, या GDP गणना में कोई बड़ा "हेरफेर" हो रहा है? भारत में GDP गणना के तरीकों को लेकर पहले भी बहस होती रही है। आधार वर्ष, GDP डिफ्लेटर, असंगठित क्षेत्र और डाटा सोर्सेज को लेकर अर्थशास्त्रियों ने अलग-अलग समय पर सवाल उठाए हैं।
आधार वर्ष का खेल क्या है?
सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर को समझने के लिए आधार प्रभाव (Base Effect) को समझना ज़रूरी है। इसे एक आसान उदाहरण से समझिए। मान लीजिए आपकी आमदनी पहले ₹100 थी, लेकिन किसी कारण से घटकर ₹50 रह गई। अगले साल आपकी आमदनी ₹50 से बढ़कर ₹54 हो जाती है। अब देखा जाए तो आपकी आमदनी में एक साल में 8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि आप अभी भी अपनी पुरानी ₹100 की आमदनी से 46 रुपये नीचे हैं। यानी वृद्धि दर 8 प्रतिशत दिखाई दे रही है, लेकिन आपकी आर्थिक स्थिति उस पुराने स्तर तक अभी वापस नहीं पहुँची है। इसी को सरल भाषा में आधार प्रभाव कहा जाता है।
भारत की अर्थव्यवस्था को देखते समय यह बात इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि कोरोना महामारी के दौरान आर्थिक गतिविधियों में बहुत बड़ी गिरावट आई थी। उसके बाद जब अर्थव्यवस्था ने दोबारा गति पकड़नी शुरू की, तो पिछली कम आधार वाली स्थिति की तुलना में वृद्धि दर काफी ऊँची दिखाई दी। इसलिए केवल किसी एक वर्ष की वृद्धि दर देखकर अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर समझना मुश्किल है।
हमें यह भी देखना होगा कि महामारी से पहले अर्थव्यवस्था जिस रास्ते पर चल रही थी, उसके मुकाबले आज हम कहाँ खड़े हैं और पिछले कुछ वर्षों में हुई वृद्धि का वास्तविक असर लोगों की आमदनी, रोज़गार, बचत और खर्च करने की क्षमता पर कितना पड़ा है। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि इस साल सकल घरेलू उत्पाद कितने प्रतिशत बढ़ा। सवाल यह भी होना चाहिए कि इस वृद्धि के बाद एक आम परिवार की आर्थिक स्थिति कितनी बेहतर हुई। अगर अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर तेज़ है, लेकिन परिवार की वास्तविक आमदनी और खर्च करने की क्षमता उसी गति से नहीं बढ़ रही, तो केवल वृद्धि दर देखकर आर्थिक खुशहाली का निष्कर्ष निकालना अधूरा होगा।
सकल घरेलू उत्पाद और महंगाई का सवाल
वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद निकालते समय कीमतों में हुई वृद्धि के प्रभाव को अलग किया जाता है। यही वह जगह है जहाँ सकल घरेलू उत्पाद अपस्फीतिकारक (GDP Deflator) यानी कीमतों में बदलाव को मापने वाला सूचक महत्वपूर्ण हो जाता है। नाममात्र (Nominal) सकल घरेलू उत्पाद में वस्तुओं और सेवाओं की मात्रा बढ़ने के साथ-साथ उनकी कीमतों में होने वाली वृद्धि भी शामिल होती है। वास्तविक वृद्धि जानने के लिए कीमतों के इस प्रभाव को अलग करना पड़ता है। यही कारण है कि अगर कीमतों में वृद्धि को मापने वाला आंकड़ा कम रहता है, तो गणितीय रूप से वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर अधिक दिखाई दे सकती है।
इसलिए सकल घरेलू उत्पाद अपस्फीतिकारक की गणना और उसमें इस्तेमाल होने वाले आंकड़ों को समझना ज़रूरी है। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण सावधानी भी ज़रूरी है। यह कहना कि सरकार ने जानबूझकर महंगाई को कम दिखाया और इसी वजह से सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर कृत्रिम रूप से बढ़ गई, एक गंभीर आरोप है और इसे साबित करने के लिए ठोस सांख्यिकीय प्रमाण की आवश्यकता होगी। यानी आंकड़ों की पद्धति पर सवाल उठाना और आंकड़ों में जानबूझकर हेरफेर का आरोप लगाना एक ही बात नहीं है। हमें दोनों के बीच अंतर रखना होगा।
आम नागरिक के लिए हालांकि सवाल बेहद सीधा है—अगर देश का सकल घरेलू उत्पाद 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है, तो उसकी अपनी वास्तविक क्रय शक्ति कितनी बढ़ी है? क्या उसकी आय में महंगाई को पीछे छोड़ने लायक वृद्धि हुई है? क्या महीने के अंत में उसके पास पहले से ज़्यादा पैसा बच रहा है? आर्थिक वृद्धि का वास्तविक असर समझने के लिए इन सवालों के जवाब भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
असंगठित अर्थव्यवस्था का क्या?
भारत में करोड़ों लोग छोटी दुकानों, रेहड़ी-पटरी, छोटे निर्माण कारोबार, घरेलू उद्योग, दिहाड़ी मज़दूरी, परिवहन और दूसरे असंगठित रोज़गारों से जुड़े हुए हैं। इसलिए अगर हमें भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति समझनी है, तो केवल बड़ी कंपनियों और संगठित क्षेत्र को देखकर पूरी तस्वीर नहीं मिल सकती।
देश के छोटे कारोबार और असंगठित क्षेत्र में होने वाले बदलाव आम लोगों की आय और रोज़गार पर सीधे असर डालते हैं। नोटबंदी, वस्तु एवं सेवा कर (GST) और कोरोना महामारी के बाद छोटे कारोबारों पर पड़े प्रभाव को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। कई क्षेत्रों में बड़े और संगठित कारोबारों ने बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है, जबकि छोटे कारोबारों को पूंजी, मांग और प्रतिस्पर्धा से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।
हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि सकल घरेलू उत्पाद की गणना केवल बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों के आंकड़ों के आधार पर की जाती है। राष्ट्रीय आय की गणना में सरकार कई अलग-अलग स्रोतों, सर्वेक्षणों, प्रशासनिक आंकड़ों और सांख्यिकीय अनुमानों का इस्तेमाल करती है। इसलिए असली सवाल यह होना चाहिए कि देश के असंगठित क्षेत्र में होने वाले बदलावों को हमारी सांख्यिकीय व्यवस्था कितनी तेज़ और कितनी सटीकता से पकड़ पाती है। अगर किसी छोटे कारोबारी की आमदनी घटती है, किसी मज़दूर को काम कम मिलता है या किसी छोटे उद्योग का कारोबार बंद हो जाता है, तो उसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसलिए बड़ी कंपनियों के अच्छे प्रदर्शन के साथ-साथ छोटे कारोबारों, रोज़गार और घरेलू आय के आंकड़ों को भी बराबर महत्व देना ज़रूरी है।
रुपया ₹96 के करीब क्यों पहुँचा?
अब बात रुपये की। डॉलर के मुकाबले रुपये का करीब ₹96 तक पहुँचना केवल विदेशी मुद्रा बाज़ार से जुड़ी खबर नहीं है। इसका असर आम आदमी की ज़िंदगी तक पहुँच सकता है। भारत अपनी कच्चे तेल की ज़रूरतों का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से खरीदता है। ऐसे में जब रुपया कमज़ोर होता है, तो समान मात्रा में कच्चा तेल खरीदने के लिए भारतीय मुद्रा में ज़्यादा पैसा खर्च करना पड़ सकता है।
कमज़ोर रुपये का असर केवल कच्चे तेल तक सीमित नहीं रहता। इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनरी, औद्योगिक उपकरण और कई दूसरे आयातित उत्पाद भी महंगे हो सकते हैं। अगर उसी समय अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत भी बढ़ रही हो और रुपया भी कमज़ोर हो रहा हो, तो महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है। परिवहन की लागत बढ़ने से उसका असर दूसरे सामान और सेवाओं की कीमतों तक भी पहुँच सकता है।
यानी डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी केवल शेयर बाज़ार या विदेशी मुद्रा कारोबार करने वालों की चिंता नहीं है। इसका असर पेट्रोल-डीजल, परिवहन, उत्पादन लागत और अंततः आम परिवार के मासिक बजट पर पड़ सकता है। यही वजह है कि रुपये की स्थिति को समझना आम आदमी की आर्थिक स्थिति को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है।
विदेशी निवेशक भारत से पैसा क्यों निकाल रहे हैं?
2026 में विदेशी निवेशकों की भारतीय शेयर बाज़ार में बड़ी बिकवाली देखने को मिली है। लेकिन इसका सीधा अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि विदेशी निवेशक केवल इसलिए भारत से पैसा निकाल रहे हैं क्योंकि उन्हें भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर पर भरोसा नहीं है।
किसी भी देश में निवेश का फैसला कई अलग-अलग परिस्थितियों को देखकर किया जाता है। भारतीय कंपनियों के मूल्यांकन, कंपनियों के सम्भावित मुनाफे, अमेरिका की ब्याज दरें, डॉलर की मजबूती, कच्चे तेल की कीमतें, अंतरराष्ट्रीय तनाव और दूसरे उभरते बाज़ारों में मिलने वाले सम्भावित लाभ जैसे कई कारक विदेशी निवेशकों के फैसले को प्रभावित करते हैं।
इसलिए विदेशी निवेशकों की बिकवाली को केवल भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी का प्रमाण मानना सही नहीं होगा। लेकिन लगातार विदेशी पूंजी बाहर जाने से बाज़ार पर दबाव ज़रूर पड़ सकता है। इससे रुपये की मांग और आपूर्ति पर भी असर पड़ सकता है और बाज़ार में निवेशकों का भरोसा कमज़ोर हो सकता है। इसलिए विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली एक महत्वपूर्ण आर्थिक संकेत है, भले ही उसके पीछे केवल एक कारण न हो।
4 जून 2024: जब शेयर बाज़ार अचानक गिर गया
अब उस घटना पर आते हैं जिसे भारतीय खुदरा निवेशक शायद ही भूलें। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव परिणामों के बाद शेयर बाज़ार में तेज़ी की उम्मीद जताई थी। दोनों नेताओं के ऐसे सार्वजनिक बयान सामने आए थे जिनमें चुनाव के बाद बाज़ार के नए स्तरों तक पहुँचने की बात कही गई थी।
चुनाव के अंतिम चरण के बाद आए ज़्यादातर जनमत सर्वेक्षणों में भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों की बड़ी जीत का अनुमान लगाया गया। इसके बाद 3 जून को शेयर बाज़ार में जोरदार तेज़ी देखने को मिली। लेकिन 4 जून को जैसे-जैसे वास्तविक चुनावी रुझान सामने आने लगे और यह स्पष्ट हुआ कि परिणाम अनुमान से अलग हो सकते हैं, बाज़ार में भारी गिरावट शुरू हो गई। उस दिन सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में करीब 6 प्रतिशत की गिरावट आई। निवेशकों की कुल संपत्ति में लगभग ₹31 लाख करोड़ की कमी दर्ज की गई। यह भारतीय शेयर बाज़ार में एक दिन में संपत्ति के सबसे बड़े क्षरण की घटनाओं में से एक था।
इस घटना ने एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा किया- जब देश के शीर्ष राजनीतिक नेता लाखों लोगों के सामने बाज़ार को लेकर कोई उम्मीद जताते हैं, तो क्या आम निवेशक उस बयान को निवेश संबंधी सलाह के रूप में ले सकता है?
हालांकि यहाँ एक बात बिल्कुल स्पष्ट रखना ज़रूरी है। यह कहना कि आम निवेशकों का पैसा विदेशी निवेशकों या बड़े कारोबारी घरानों ने निकाल लिया और इसी वजह से आम लोगों को नुकसान हुआ, एक गंभीर दावा है। केवल उस दिन बाज़ार में हुई गिरावट से यह साबित नहीं किया जा सकता कि किस श्रेणी के निवेशक ने किस कीमत पर खरीदा और किस कीमत पर बेचा। इसके लिए विस्तृत लेन-देन संबंधी आंकड़ों की ज़रूरत होगी।
क्या नेताओं को शेयर बाज़ार में निवेश की सलाह देनी चाहिए?
यहीं से एक बड़ा सार्वजनिक सवाल पैदा होता है। जब प्रधानमंत्री या गृह मंत्री जैसे शीर्ष राजनीतिक नेता शेयर बाज़ार के बारे में सार्वजनिक रूप से कोई अनुमान या सलाह देते हैं, तो उसका प्रभाव सामान्य राजनीतिक बयान से अलग हो सकता है। करोड़ों लोग नेताओं को सुनते हैं और उनमें से बड़ी संख्या में लोग अपनी बचत को निवेश करने के लिए ऐसे बयानों से प्रभावित भी हो सकते हैं।
शेयर बाज़ार में किसी भी अनुमान की कोई गारंटी नहीं होती। बाज़ार चुनाव परिणाम, ब्याज दर, वैश्विक परिस्थितियों, कंपनियों के मुनाफे और निवेशकों की उम्मीदों जैसे कई कारकों पर एक साथ प्रतिक्रिया करता है। इसलिए किसी भी राजनीतिक नेता द्वारा बाज़ार की दिशा को लेकर किया गया अनुमान सही साबित हो, यह ज़रूरी नहीं है।
4 जून 2024 की घटना ने इसी ज़िम्मेदारी पर बहस को और महत्वपूर्ण बना दिया। सवाल यह है कि क्या संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं को आम नागरिकों की मेहनत की कमाई से जुड़े निवेश संबंधी मामलों में इस तरह की सार्वजनिक भविष्यवाणी करनी चाहिए और अगर करनी चाहिए, तो उसकी ज़िम्मेदारी की सीमा क्या होनी चाहिए?
महंगाई, कॉरपोरेट कर और आम आदमी
2019 में सरकार ने घरेलू कंपनियों के लिए कॉरपोरेट कर की दरों में बड़ी कटौती की थी। सरकार का तर्क था कि इससे कंपनियों के पास निवेश के लिए अधिक पैसा बचेगा, उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा, नए निवेश आएंगे और रोज़गार के अवसर पैदा होंगे। यह उस समय की आर्थिक नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।
दूसरी तरफ आम नागरिक अपने रोज़मर्रा के खर्चों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों का असर महसूस करता है। खाद्य पदार्थ, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और दूसरी आवश्यकताओं की कीमतों में बदलाव सीधे घरेलू बजट को प्रभावित करता है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि कॉरपोरेट कर घटाया गया या नहीं। सवाल यह भी होना चाहिए कि उस कर नीति का वास्तविक असर निवेश, रोज़गार, मज़दूरी और आम परिवार की आय पर कितना पड़ा। अगर कंपनियों को कर में राहत दी गई, तो उससे कितने नए निवेश हुए, कितने रोज़गार बने और उसका कितना लाभ व्यापक अर्थव्यवस्था तक पहुँचा—यही उस नीति के प्रभाव को समझने का बेहतर तरीका होगा।
बैंक के कर्ज़ को बट्टे खाते में डालना और कर्ज़ माफ करना अलग है
बड़े कारोबारी कर्ज़ को बट्टे खाते (Write-off) में डालने को लेकर भी आम लोगों के बीच काफी नाराज़गी रहती है। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना ज़रूरी है। बैंक द्वारा किसी कर्ज़ को बट्टे खाते में डालना और सरकार द्वारा किसी कर्ज़ को माफ कर देना एक ही बात नहीं है। बट्टे खाते में डालना मुख्य रूप से बैंक की लेखा प्रक्रिया (Accounting Process) का हिस्सा है। इसका अर्थ यह नहीं होता कि कर्ज़ लेने वाले व्यक्ति या कंपनी की कानूनी देनदारी अपने आप समाप्त हो गई। कई मामलों में बैंकों द्वारा ऐसे कर्ज़ की वसूली की प्रक्रिया आगे भी जारी रहती है।
इसलिए बैंकिंग व्यवस्था की वास्तविक स्थिति समझने के लिए केवल बट्टे खाते में डाले गए कर्ज़ का आंकड़ा देखना पर्याप्त नहीं है। हमें यह भी देखना होगा कि कितनी रकम की वसूली हुई, कितने कर्ज़ खराब हुए, कितने मामलों में धोखाधड़ी सामने आई और बैंकों की वित्तीय स्थिति पर इसका क्या असर पड़ा।
80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन: सवाल क्या है?
सरकार की खाद्य सुरक्षा योजनाओं के तहत करोड़ों लोगों को मुफ्त या रियायती दरों पर अनाज उपलब्ध कराया जा रहा है। यह व्यवस्था अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि देश की आर्थिक वृद्धि गलत है। किसी भी तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में भी सरकार गरीब और कमज़ोर वर्ग के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएं चला सकती है।
लेकिन इतनी बड़ी आबादी को खाद्य सुरक्षा सहायता की ज़रूरत होना एक महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक सवाल ज़रूर पैदा करता है। अगर देश की अर्थव्यवस्था तेज़ गति से बढ़ रही है, तो क्या उस वृद्धि के साथ लोगों की आय और जीवन स्तर में भी पर्याप्त सुधार हो रहा है? क्या परिवार अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के बाद पर्याप्त बचत कर पा रहे हैं?
इन सवालों का जवाब केवल सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर से नहीं मिल सकता। इसके लिए गरीबी, घरेलू आय, रोज़गार, पोषण, उपभोग और परिवारों की बचत जैसे अलग-अलग आंकड़ों को एक साथ देखना होगा। तभी यह समझ में आएगा कि आर्थिक वृद्धि का वास्तविक लाभ समाज के कितने हिस्से तक पहुँच रहा है।
"मैं शेयर बाज़ार में पैसा नहीं लगाता"—फिर मुझे क्या फर्क पड़ता है?
बहुत से लोग सोच सकते हैं कि अगर उन्होंने शेयर बाज़ार में निवेश नहीं किया है, तो बाज़ार की गिरावट से उन्हें क्या फर्क पड़ता है। लेकिन अर्थव्यवस्था और शेयर बाज़ार पूरी तरह अलग-अलग दुनिया नहीं हैं। बाज़ार में होने वाली हलचल कंपनियों के निवेश, कारोबारियों के भरोसे, उपभोक्ताओं के विश्वास और भविष्य की आर्थिक गतिविधियों पर असर डाल सकती है।
हालांकि यह कहना भी सही नहीं होगा कि हर भारतीय की भविष्य की बचत सीधे शेयर बाज़ार में लगी हुई है। अलग-अलग निवेश योजनाओं की अपनी अलग निवेश संरचना होती है। भविष्य निधि (PF) की रकम भी नियामक व्यवस्था के तहत अलग-अलग साधनों में निवेश की जाती है। इसलिए बाज़ार में गिरावट का असर हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं पड़ता। फिर भी शेयर बाज़ार की लंबी अवधि की दिशा, कंपनियों के मुनाफे, ब्याज दरों और आर्थिक गतिविधियों का असर व्यापक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इसलिए शेयर बाज़ार की स्थिति को केवल निवेशकों की समस्या मानकर नज़रअंदाज़ करना भी ठीक नहीं होगा।
आखिरकार असली सवाल क्या है?
7.8 प्रतिशत की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण आर्थिक संकेतक है। लेकिन यह पूरी अर्थव्यवस्था की तस्वीर नहीं है। किसी देश की आर्थिक स्थिति समझने के लिए सकल घरेलू उत्पाद के साथ घरेलू आय, रोज़गार, खपत, बचत, महंगाई, कंपनियों के मुनाफे, निवेश, निर्यात, मुद्रा की स्थिति और आय की असमानता जैसे कई दूसरे सूचकों को भी देखना पड़ता है।
इसी तरह शेयर बाज़ार में गिरावट अपने आप यह साबित नहीं करती कि देश की अर्थव्यवस्था खराब हो रही है। शेयर बाज़ार भविष्य की उम्मीदों, कंपनियों के मूल्यांकन, वैश्विक पूंजी और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से भी प्रभावित होता है। लेकिन अगर आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ घरेलू परिवारों पर वित्तीय दबाव, कमज़ोर खपत, विदेशी पूंजी की निकासी और रुपये में कमजोरी जैसे संकेत भी दिखाई दें, तो उन सवालों को नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता। इसलिए बहस केवल इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि सकल घरेलू उत्पाद 7.8 प्रतिशत बढ़ा है या शेयर बाज़ार गिर रहा है। हमें दोनों के बीच के संबंध को समझने के साथ-साथ उन आंकड़ों को भी देखना होगा जो आम लोगों की ज़िंदगी की वास्तविक तस्वीर सामने रखते हैं।
आंकड़ों की चमक और ज़मीन की हकीकत
अंततः बहस यह तय करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि सकल घरेलू उत्पाद का आंकड़ा सही है या गलत। असली सवाल इससे कहीं बड़ा है।
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क्या भारत की आर्थिक वृद्धि आम भारतीय की ज़िंदगी में भी दिखाई दे रही है?
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क्या लोगों की आमदनी बढ़ रही है?
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क्या उनकी क्रय शक्ति बढ़ रही है?
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क्या पर्याप्त रोज़गार पैदा हो रहे हैं?
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क्या छोटे कारोबार मज़बूत हो रहे हैं?
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क्या परिवार पहले से ज़्यादा बचत कर पा रहे हैं?
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क्या महंगाई को निकालने के बाद भी लोगों की वास्तविक आय बढ़ रही है?
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और सबसे महत्वपूर्ण - क्या आर्थिक वृद्धि का लाभ समाज के बड़े हिस्से तक पहुँच रहा है?
क्योंकि किसी भी अर्थव्यवस्था की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि उसका सकल घरेलू उत्पाद कितनी तेज़ी से बढ़ा। यह भी देखना होगा कि उस वृद्धि का लाभ किसे मिला, किसकी आय बढ़ी, किसके रोज़गार सुरक्षित हुए और किसकी ज़िंदगी वास्तव में बेहतर हुई। यही वह सवाल है जिसे राजनीतिक भाषणों, टेलीविजन की सुर्ख़ियों और बाज़ार के रोजाना उतार-चढ़ाव से बाहर निकलकर आंकड़ों की पूरी तस्वीर के साथ पूछने की ज़रूरत है।





