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जब 'विदेशी फंडिंग' सिर्फ एक राजनीतिक हथियार बन जाए: आवाजों को दबाने की दोहरी नीति

सरकार विरोधी आवाजों पर विदेशी फंडिंग का आरोप क्यों लगाया जाता है? जानिए क्या है असली सच्चाई और मीडिया की दोहरी नीति का पूरा सच।

जब 'विदेशी फंडिंग' सिर्फ एक राजनीतिक हथियार बन जाए: आवाजों को दबाने की दोहरी नीति
फोटो: विदेशी फंडिंग, जॉर्ज सोरोस, एफसीआरए, मीडिया रिपोर्ट्स, राजनीतिक नैरेटिव

बाहरी फंडिंग का डर और आंदोलनों पर लगते आरोप

जब भी देश में सरकार के खिलाफ कोई आवाज उठती है, तो सबसे पहले उसके पीछे विदेशी ताकतों और पैसों का हाथ होने की कहानी गढ़ी जाती है। चाहे वह किसान आंदोलन हो, सीएए के खिलाफ शाहीन बाग का प्रदर्शन हो या फिर विपक्ष द्वारा उठाए गए अन्य मुद्दे, हर बार यही नैरेटिव सेट किया जाता है कि ये प्रदर्शनकारी अपने आप नहीं निकले, बल्कि इन्हें विदेश से फंडिंग मिल रही है। इस तरह के आरोपों का मुख्य उद्देश्य आम जनता के मन में यह भ्रम पैदा करना है कि सरकार से सवाल पूछने वाले या जमीनी हकीकत दिखाने वाले लोग असल में विदेशी एजेंट हैं।

 

जॉर्ज सोरोस का नैरेटिव और सबूतों की कमी

सरकार और उसके समर्थक अक्सर अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस का नाम लेकर हर विरोध प्रदर्शन को जोड़ते हैं। फरवरी 2023 में म्यूनिक सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में सोरोस द्वारा अडानी के मामले पर टिप्पणी किए जाने के बाद यह हमला और तेज हो गया। हालांकि, सोरोस का ओपन सोसाइटी फाउंडेशन (OSF) मुख्य रूप से रजिस्टर्ड एनजीओ, यूनिवर्सिटीज और मीडिया प्रोजेक्ट्स को ग्रांट देता है, और इसके सारे रिकॉर्ड पब्लिक डोमेन में होते हैं। सरकार या उसके समर्थक आज तक ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सके हैं जो किसी भारतीय आंदोलन का सीधा संबंध सोरोस की फंडिंग से साबित कर सके।

 

चुनिंदा वेबसाइट्स पर विदेशी पैसे और FCRA नियमों की अनदेखी

एक तरफ जहां एमनेस्टी इंटरनेशनल, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (CPR) और मदर टेरेसा की संस्था जैसी कई मानवाधिकार और शोध संस्थाओं के विदेशी फंड और एफसीआरए (FCRA) लाइसेंस पर कार्रवाई की गई, वहीं दूसरी तरफ कुछ चुनिंदा मीडिया आउटलेट्स और वेबसाइट्स पर दोहरे मापदंड अपनाए जाते हैं। बेल्लिंगकैट की रिपोर्ट के अनुसार, OpIndia, हिंदू एक्विस्टेंस, हिंदू पोस्ट और जयपुर डायलॉग्स जैसी वेबसाइट्स पर विदेशी मुद्राओं (PayPal, अमेरिकी संस्थाओं और डिजिटल कंपनियों) के जरिए भारी मात्रा में फंड मिलने के संकेत मिले हैं, इसके बावजूद इनके वित्तीय लेन-देन और एफसीआरए नियमों की वैधता पर कोई सख्त जांच नहीं की जाती।

 

निष्कर्ष: पारदर्शिता या आलोचना दबाने का जरिया?

असली मुद्दा फंडिंग की पारदर्शिता का नहीं, बल्कि सरकार की आलोचना का है। यदि कोई संस्था या मीडिया हाउस सरकार की चापलूसी करता है, तो उसके पैसे पर कोई सवाल नहीं उठाया जाता, लेकिन यदि कोई निष्पक्ष सवाल या आलोचना करे, तो उसे देशविरोधी करार दे दिया जाता है। विदेशी फंडिंग के नियमों की कसौटी देश में सभी पर एक समान लागू होनी चाहिए, तभी लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रह सकती है।

इस पूरी खबर को वीडियो फॉर्मेट में देखिए के लिए, क्लिक करें नीचे दिए गए लिंक पर- https://youtu.be/MhogqDD3ZJs?si=Q4dU8lZT0e0pnTHz

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