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डिजिटल सेंसरशिप और पेड मास-रिपोर्टिंग: क्या खतरे में है देश की स्वतंत्र पत्रकारिता?

सोशल मीडिया पर स्वतंत्र पत्रकारों के अकाउंट बैन और DPDP कानून के लागू होने से देश में स्वतंत्र व खोजी पत्रकारिता पर गहराया बड़ा संकट।

डिजिटल सेंसरशिप और पेड मास-रिपोर्टिंग: क्या खतरे में है देश की स्वतंत्र पत्रकारिता?
फोटो: डिजिटल सेंसरशिप, सोशल मीडिया अकाउंट बैन, आईटी रूल्स 2021, डीपीडीपी एक्ट 2023, स्वतंत्र पत्रकारिता

हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर स्वतंत्र पत्रकारों, कार्टूनिस्टों और डिजिटल मीडिया पोर्टल्स के अकाउंट्स व पोस्ट्स को बिना स्पष्ट कारण बताए रिस्ट्रिक्ट या डिसेबल करने के मामलों में भारी वृद्धि हुई है। आईटी रूल्स 2021 के तहत जारी हो रहे ब्लॉकिंग ऑर्डर्स और आगामी डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट 2023 के कड़े प्रावधानों ने देश में स्वतंत्र और खोजी पत्रकारिता (Investigative Journalism) के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

स्वतंत्र मीडिया और पत्रकारों पर बढ़ता शिकंजा

'4 PM नेशनल', 'लाइव लॉ' (Live Law) और स्वतंत्र पत्रकारों के इंस्टाग्राम अकाउंट्स को हाल ही में रिस्ट्रिक्ट या ब्लॉक कर दिया गया। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में प्लेटफॉर्म्स को हर दिन औसतन 1,200 से अधिक ब्लॉकिंग आदेश भेजे जा रहे हैं। इन कार्रवाइयों में पारदर्शिता की कमी सबसे बड़ी समस्या है, जहाँ क्रिएटर्स को बिना पूर्व सूचना, कारण या विस्तृत आदेश संख्या दिए सीधे अकाउंट बंद या सीमित कर दिए जाते हैं।

 

पैसे देकर अकाउंट बैन कराने वाला 'डिजिटल सुपारी' का बाजार

सेंसरशिप के सरकारी आदेशों के साथ-साथ एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आया है—'मास रिपोर्टिंग' के जरिए पैसे लेकर अकाउंट्स बैन कराने वाले सिंडिकेट। कई ऐसी वेबसाइट्स सक्रिय हैं जो महज कुछ रुपये या डॉलर लेकर बोट्स (Bots) और फर्जी अकाउंट्स के जरिए लक्षित पेजों के खिलाफ लगातार शिकायतें भेजती हैं। इससे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के ऑटोमेटेड सिस्टम भ्रमित होकर वास्तविक और निष्पक्ष पत्रकारों के खातों को सस्पेंड कर देते हैं।

 

DPDP एक्ट 2023 और RTI पर आघात

अगस्त 2023 में पारित और मई 2027 तक पूरी तरह लागू होने जा रहे डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट को लेकर डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। मुख्य चिंताएँ इस प्रकार हैं:

  • सहमति की शर्त: खोजी पत्रकारिता के दौरान किसी संदिग्ध या भ्रष्ट अधिकारी की जानकारी छापने से पहले उसकी सहमति की बाध्यता।

  • RTI में संशोधन: आरटीआई अधिनियम की धारा 4(4)(3) में बदलाव के बाद जनहित से जुड़ी कई निजी जानकारियों को छिपाने का कानूनी रास्ता साफ होना।

  • सूत्रों की गोपनीयता: व्हिसलब्लोअर्स और गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर होने का बढ़ता जोखिम।

 

लोकतंत्र में सूचना के प्रवाह पर सवाल

डिजिटल मीडिया और कंटेंट क्रिएशन इकॉनमी लाखों लोगों को रोज़गार देती है। ऐसे में बिना किसी स्पष्ट न्यायिक समीक्षा या उचित नोटिस के अकाउंट्स को सेंसर करना न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार है, बल्कि आम नागरिकों तक निष्पक्ष खबरें पहुँचाने की राह में भी एक बड़ी रुकावट साबित हो रहा है।

इस पूरी खबर को वीडियो फॉर्मेट में देखिए के लिए, क्लिक करें नीचे दिए गए लिंक पर- https://youtu.be/9ex_6NCL8wQ?si=-rbJZeN7tbhLISHF

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