न्यायिक प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने न्यायिक प्रणाली को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और त्वरित बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनके अनुसार, उच्च न्यायालय में लंबित मामलों की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख करने वाले याचिकाकर्ताओं की संख्या में वृद्धि हो रही है। यह स्थिति न्याय व्यवस्था में सुधार की संभावनाओं पर विचार करने का एक अवसर प्रस्तुत करती है।
CJI ने प्रश्न उठाया कि क्या प्राथमिक मामलों की पहचान को और बेहतर बनाया जा सकता है? उन्होंने यह भी पूछा कि क्या सुनवाई की तिथियों को निर्धारित करने की प्रक्रिया को अधिक विश्वसनीय और पारदर्शी बनाया जा सकता है। तकनीकी सहायता के माध्यम से उन मामलों को प्राथमिकता देने की बात भी की गई है, जिनमें विलंब से किसी पक्ष को ऐसे नुकसान का सामना करना पड़ सकता है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है।
कोच्चि में 75 साल पूरे हुए केरल हाई कोर्ट का जश्न
CJI ने यह बयान रविवार को कोच्चि में आयोजित समारोह में दिया, जिसमें केरल उच्च न्यायालय की स्थापना के 75 वर्ष पूरे होने का जश्न मनाया गया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा उच्च न्यायालयों की संस्थागत स्वतंत्रता और उनके मामलों की सुनवाई के क्रम को निर्धारित करने के अधिकार का सम्मान किया है।
हालांकि, उन्होंने उच्च न्यायालय में लंबित मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट तक जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंतन करने की आवश्यकता पर बल दिया। सूर्यकांत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को समय पर न्याय पाने के लिए दिल्ली तक यात्रा करने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, क्योंकि भारत की संवैधानिक न्याय प्रणाली केवल नई दिल्ली तक सीमित नहीं है।
नागरिक अधिकारों की रक्षा में उच्च न्यायालय की भूमिका
CJI सूर्यकांत ने कहा कि देशभर में स्थित 25 उच्च न्यायालयों की जिम्मेदारी नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा और कानून के शासन को बनाए रखना है। ये उच्च न्यायालय स्थानीय समस्याओं और सरकारी निर्णयों के प्रभाव को बेहतर तरीके से समझते हैं। संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत, उन्हें विभिन्न कानूनी, प्रशासनिक और सरकारी मामलों में प्रभावी राहत प्रदान करने का अधिकार दिया गया है।
उन्होंने बताया कि कई बार न्याय मिलने का फैसला इस बात पर निर्भर करता है कि अदालत ने जरूरत के समय अंतरिम राहत दी या नहीं।
केरल हाई कोर्ट का ऐतिहासिक सफर
CJI ने केरल उच्च न्यायालय के 75 वर्षों की यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि केरल राज्य और उच्च न्यायालय दोनों की स्थापना 1956 में हुई थी। पिछले सात दशकों में, दोनों का विकास एक-दूसरे से जुड़ा रहा है। इस अवधि में, उच्च न्यायालय ने राज्य के संवैधानिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
उन्होंने बताया कि उच्च न्यायालय के निर्णयों ने नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा के साथ-साथ यह सुनिश्चित किया कि सरकारी शक्तियों का उपयोग कानून के दायरे में किया जाए। सूर्यकांत ने कहा कि केरल उच्च न्यायालय की न्यायिक परंपरा राज्य के गठन से भी पुरानी है, जिसमें पहले त्रावणकोर और कोचीन की अदालतें शामिल थीं।





