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भाजपा का मुस्लिम मतदाताओं में बढ़ता प्रभाव, असम की नगांव सीट पर जीत का रहस्य

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की रणनीति ने भाजपा को महत्वपूर्ण जीत दिलाई।

भाजपा का मुस्लिम मतदाताओं में बढ़ता प्रभाव, असम की नगांव सीट पर जीत का रहस्य
फोटो: BJP's Growing Influence Among Muslim Voters: The Secret Behind Victory in Assam's Nagaon Seat

विपक्ष के प्रयासों के बावजूद भाजपा का वर्चस्व

देश भर में विपक्ष लगातार आंदोलन के जरिए सरकार के खिलाफ माहौल बनाने का प्रयास कर रहा है। इस संदर्भ में मीडिया और सोशल मीडिया पर चर्चा जारी है। लेकिन जब चुनावी राजनीति की बात आती है, तो भाजपा का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। हाल में हुए विधानसभा और लोकसभा उपचुनावों के परिणामों ने विपक्ष को चौंका दिया है, खासकर पश्चिम बंगाल की रेजीनगर और असम की नगांव विधानसभा सीटों पर भाजपा की जीत ने उनकी चिंताओं को और बढ़ा दिया है।


रेजीनगर में भाजपा की जीत के बाद पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि अब मुस्लिम समुदाय भाजपा के मित्र बन गए हैं। इस चर्चा के बीच, आज हम असम के नगांव लोकसभा सीट पर ध्यान केंद्रित करेंगे, जो लगभग 13% मुस्लिम मतदाताओं की संख्या के लिए जानी जाती है।


मुख्यमंत्री सरमा की रणनीति

नगांव सीट पर भाजपा की जीत के पीछे मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को मुख्य रणनीतिकार माना जा रहा है। उपचुनाव में भाजपा की योजना और रणनीति काफी सफल रही है। 2023 में सीटों के पुनर्विभाजन के बाद नगांव सीट मुस्लिम-बहुल हो गई थी, जिससे भाजपा की जीत की संभावना कम नजर आ रही थी। सरमा ने स्वयं उम्मीदवार चयन और चुनाव प्रचार की रणनीति को संभाला। भाजपा ने यहां पूर्व IAS अधिकारी देवाशीष शर्मा को प्रत्याशी बनाया, जिन्होंने बदरुद्दीन अजमल को लगभग 1.4 लाख मतों से हराया। कांग्रेस इस सीट पर तीसरे स्थान पर रही।


मुस्लिम वोटरों में ध्रुवीकरण की रोकथाम

हिमंत सरमा ने उपचुनाव से पहले ही देवाशीष शर्मा को नगांव का कमिश्नर नियुक्त कर दिया था। इस दौरान उन्होंने सभी समुदायों के लिए कल्याणकारी योजनाओं को प्रभावी ढंग से पहुंचाने का प्रयास किया, जिससे उनकी छवि को बढ़ावा मिला। उपचुनाव के प्रचार के दौरान यह सुनिश्चित किया गया कि मुस्लिम वोटरों का विपरीत ध्रुवीकरण न हो, जिसके लिए प्रचार को जानबूझकर कमतर रखा गया। इस रणनीति से हिंदू मतदाता एकजुट हो गए।


इस उपचुनाव में बदरुद्दीन अजमल ने देर से चुनावी मैदान में प्रवेश किया, जिससे विपक्ष में विभाजन हुआ और विचारधारात्मक मुद्दों का प्रभाव कम हो गया। हिमंत सरमा को चुनाव प्रबंधन में माहिर माना जाता है, और उनकी पिछली हार से सीखने की प्रवृत्ति ने उन्हें इस उपचुनाव की तैयारी समय से पहले करने के लिए प्रेरित किया।