कोटा में जन हस्ताक्षर अभियान के तहत ‘अरावली बचाओ देश बचाओ’ अभियान
कोटा में अरावली सुप्रीम कोर्ट दिशानिर्देश के बाद रविवार को 'अरावली बचाओ देश बचाओ' जन हस्ताक्षर अभियान की शुरुआत की गई। किशोर सागर तालाब की पाल पर 'सोसाइटी हैस इव शी इंटरनेशनल चैरिटेबल ट्रस्ट' के नेतृत्व में सामाजिक संस्थाओं ने अभियान चलाया। कार्यक्रम के दौरान नुक्कड़ नाटक के माध्यम से पर्यावरणीय और सामाजिक दुष्परिणामों को दिखाया गया। सैकड़ों लोगों और बच्चों ने उत्साहपूर्वक हस्ताक्षर कर विरोध दर्ज कराया। 'अरावली रहेगी तो देश रहेगा" जैसे नारे लगाए गए।
अभियान में शामिल यज्ञदत्त हाड़ा का कहना है - हस्ताक्षरों से बने बैनर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को भेजा जाएगा, ताकि पर्यावरण हित में इस निर्णय पर पुनर्विचार का अनुरोध किया जा सके।
जयपुर में 'अरावली विरासत जन अभियान' का शुभारंभ
राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर जयपुर के ‘न्याय निर्माण मेला’ में ‘अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस’ के अवसर पर अरावली सुप्रीम कोर्ट दिशानिर्देश के फैसले के बाद अरावली पर्वतमाला से सटे दिल्ली-एनसीआर, दक्षिण हरियाणा और राजस्थान के कई जिलों में रहने वाले ग्रामीण, शहरी समूहों ने 11 दिसंबर 2025 को जयपुर में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ‘अरावली बचाओ सम्मेलन’ में भाग लिया। जिसका उद्देश्य अरावली को खनन मुक्त रखने की योजना है।
जानिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला और उससे पड़ने वाले प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने खनन के संबंध में 'अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं की परिभाषा तय की है। जिसमें पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा की गई सिफारिशों को स्वीकार कर लिया गया है। फैसले के अनुसार, किसी भू-आकृति को अरावली परिदृश्य का हिस्सा तभी माना जाएगा जब उसकी ऊंचाई, भू-आकृति की ढलानों और आसपास के क्षेत्रों सहित, स्थानीय भू-भाग से कम से कम 100 मीटर ऊँची हो। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) के आकलन के मुताबिक, राजस्थान के 15 जिलों में स्थित अरावली पर्वत श्रृंखला के 80% हिस्से में 12,081 मानचित्रित पहाड़ियों में से केवल 1048 पहाड़ियाँ ही 100 मीटर की ऊंचाई के मानदंड को पूरा करती हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला चिंताजनक है|
अरावली पर्वतमाला की बनावट और खनन से पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव
अरावली पर्वतमाला दो सौ से अधिक देशी और प्रवासी पक्षी प्रजातियों, सौ से अधिक तितली प्रजातियों, कई सरीसृप और स्तनधारी प्रजातियों का घर है। जिनमें तेंदुए, बाघ, लकड़बग्घे, सियार, नीलगाय, साही, सिवेट बिल्ली आदि जीव-जंतु शामिल हैं। खनन के कारण और अधिक पहाड़ियों और जंगलों के नष्ट होने से वन्यजीवों के आवास सिकुड़ेंगे। हरित आवरण का क्षय हो सकता है। मानव-पशु संघर्ष बढ़ेगा। अरावली पहाड़ियों के वृक्ष और घने जंगल वातावरण में नमी बनाए रखने, हवा की गति को नियंत्रित करने और इस प्रकार वर्षा के पैटर्न को नियमित करने में सहायक होते हैं। अरावली वन उत्तर पश्चिम भारत के लिए सुरक्षात्मक हरे फेफड़ों का काम करते हैं। यह जंगल तापमान को नियंत्रित करने और क्षेत्र के समग्र जलवायु परिवर्तन को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अरावली सुप्रीम कोर्ट दिशानिर्देश के फैसले के परिणामस्वरूप खनन के कारण अरावली पहाड़ियों और वनों के नष्ट होने से वातावरण में धूल का स्तर बढ़ेगा, वायु गुणवत्ता खराब होगी।
स्थानीय निवासियों पर खनन से पड़ने वाले प्रभाव
सिरोही स्थित भाखर भित्रोत विकास मंच के लक्ष्मी और बाबू गरासिया कहते हैं, "हम गरासिया जनजाति से हैं। जो पीढ़ियों से दक्षिण राजस्थान की अरावली पर्वतमाला में निवास करते आ रहे हैं। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक हमारा जीवन पहाड़ों और जंगलों से गहराई से जुड़ा हुआ है। हम भोजन, ईंधन, औषधीय जड़ी-बूटियों और बांस एवं तेंदु के पत्तों जैसी कच्ची सामग्री के लिए जंगलों पर निर्भर हैं, जिन्हें हम इकट्ठा करके बेचते हैं। अगर पहाड़ हैं, तो हम हैं। हमारे लिए ये पहाड़ हमारे भगवान हैं। हम अरावली वन संरक्षण की मांग करते हैं |
उत्तरी राजस्थान के जमीनी स्तर के पर्यावरण कार्यकर्ता कैलाश मीणा ने कहा, "अत्यधिक भूजल दोहन के कारण राजस्थान और हरियाणा में जल संकट गंभीर स्थिति में पहुंच गया है।अरावली रेंज राजस्थान के 88% ब्लॉक गंभीर, अर्ध-गंभीर या अति-शोषित श्रेणी में आते हैं। जुलाई 2024 में जारी एक हालिया अध्ययन से पता चला है कि हरियाणा के 22 जिलों में से 16 जिलों ने 2023 में भूमिगत जल का 100% से अधिक दोहन किया, जिनमें कुरुक्षेत्र, गुरुग्राम और फरीदाबाद में 200% से अधिक दोहन हुआ। अरावली पर्वतमाला उत्तर पश्चिम भारत के लिए एक महत्वपूर्ण जल पुनर्भरण क्षेत्र है और इस क्षेत्र की जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इसे हर कीमत पर बचाना आवश्यक है।
अरावली विरासत जन अभियान की मांग
पीपल यूनियन फॉर सिविल लिबर्टिज की राष्ट्रीय अध्यक्ष कविता श्रीवास्तव ने कहा, "अरावली विरासत जन अभियान मांग करता है कि सर्वोच्च न्यायालय 20 नवंबर 2025 के उस फैसले को वापस ले जिसमें अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की नई परिभाषा तय की गई थी। अरावली सुप्रीम कोर्ट दिशानिर्देश के फैसले का विरोध लाखों लोगों को प्रदान की जाने वाली पारिस्थितिक सेवाओं के लिए और हमारे बहुमूल्य वन्यजीवों के घर की रक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है।
ऐसे में मानव बस्तियों, कृषि क्षेत्रों, जल निकायों और वन्यजीव संवेदनशील क्षेत्रों के पास सभी प्रकार के खनन और पत्थर तोड़ने की गतिविधियों के साथ-साथ अपशिष्ट पदार्थों का डंपिंग और जलाना बंद किया जाना चाहिए, ताकि हमारे ग्रामीण समुदाय इन गतिविधियों के प्रतिकूल स्वास्थ्य और आजीविका संबंधी प्रभावों से पीड़ित हुए बिना सम्मानजनक जीवन जी सकें और हमारे मवेशी और वन्यजीव प्रदूषण रहित वातावरण में रह सकें। यह भी अत्यावश्यक है कि राजस्थान सरकार अरावली को लेकर सख्त एक्शन लें और वैकल्पिक निर्माण सामग्री को मुख्यधारा में लाए ताकि हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में अरावली पहाड़ियों से खनन किए गए कच्चे पत्थरों का उपयोग बंद हो सके।





