वकीलों की स्वतंत्रता को ठेस, न्याय प्रणाली के लिए खतरा
पीठ ने स्पष्ट किया कि वकीलों को उनकी पेशेवर भूमिकाओं में कुछ विशेषाधिकार और सुरक्षा प्राप्त हैं। कोर्ट ने कहा,
"कानूनी पेशा न केवल न्याय प्रशासन की रीढ़ है, बल्कि यह जरूरी है कि वकील बिना भय या दबाव के अपने दायित्वों का निर्वहन करें। अगर जांच एजेंसियां पक्षकारों के वकीलों को सीधे समन भेजती हैं, तो यह पेशे की स्वायत्तता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला है।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि यह मामला केवल किसी एक वकील का नहीं है, बल्कि पूरे विधिक पेशे और न्यायिक प्रणाली की निष्पक्षता से जुड़ा है। इसलिए, एजेंसियों द्वारा वकीलों को समन भेजने की अनुमति "प्रथम दृष्टया अस्वीकार्य" प्रतीत होती है।
क्या एजेंसियां किसी वकील को सीधे समन भेज सकती हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि क्या कोई जांच एजेंसी/पुलिस/अभियोजन पक्ष किसी वकील को, जो केवल एक पक्ष को कानूनी सलाह दे रहा हो, सीधे समन भेज सकती है?
यदि वकील की भूमिका एक सामान्य वकील से अधिक हो, तो भी क्या उसे समन भेजने से पहले न्यायिक अनुमति आवश्यक नहीं होनी चाहिए?
गौरतलब है कि ईडी ने इस विवाद के बाद अपने सभी अधिकारियों को निर्देश जारी किया कि किसी भी वकील को केवल निदेशक की पूर्व अनुमति से ही समन जारी किया जाए। 20 जून को जारी सर्कुलर में यह भी कहा गया कि बीएसए, 2023 की धारा 132 का उल्लंघन करते हुए कोई भी समन जारी नहीं किया जाए। यह निर्देश Religare Enterprises की पूर्व अध्यक्ष रश्मि सलूजा को दिए गए कानूनी परामर्श के संदर्भ में जारी हुआ था।
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