Molitics Logo
होम कानून इंटरनेट मौलिक अधिकार है, फिर बच्चों पर बैन की बहस क्यों? भारत में शटडाउन के आंकड़े भी सवालों के घेरे में
कानून • दिल्ली

इंटरनेट मौलिक अधिकार है, फिर बच्चों पर बैन की बहस क्यों? भारत में शटडाउन के आंकड़े भी सवालों के घेरे में

इंटरनेट का इस्तेमाल मौलिक अधिकार, बच्चों को भी हक

इंटरनेट मौलिक अधिकार है, फिर बच्चों पर बैन की बहस क्यों? भारत में शटडाउन के आंकड़े भी सवालों के घेरे में
फोटो: AI Generated Image

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट का इस्तेमाल करना बच्चों समेत हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। वहीं, भारत में 2025 में 65 बार इंटरनेट बंद किया गया। दुनिया के कई देश बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर उम्र के आधार पर पाबंदियां लगा रहे हैं। भारत के कुछ राज्यों में भी इस पर विचार हो रहा है। ऐसे में सवाल है कि इंटरनेट की जरूरत, बच्चों की सुरक्षा और नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनेगा?

इंटरनेट आज हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा है। पढ़ाई, नौकरी, कारोबार और खबरों के लिए इस पर निर्भरता बढ़ी है। बच्चों के लिए भी यह सीखने, नई जानकारी हासिल करने और अपनी बात रखने का माध्यम है। लेकिन इंटरनेट की दुनिया पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। बच्चों को साइबर बुलिंग, ऑनलाइन शोषण, नुकसानदेह सामग्री और अनजान लोगों के संपर्क जैसे खतरों का सामना करना पड़ सकता है। इसी वजह से दुनिया भर में बहस चल रही है कि बच्चों को इंटरनेट और सोशल मीडिया इस्तेमाल करने की कितनी आजादी मिलनी चाहिए।

इसी बीच, 17 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट तक पहुंच और उसका इस्तेमाल करने का अधिकार हर व्यक्ति को है, बच्चों को भी। अदालत ने बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखने के विचार पर सवाल उठाया और कहा कि उनकी सुरक्षा और स्वतंत्रता, दोनों जरूरी हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को सोशल मीडिया और अन्य ऑनलाइन सेवाओं से हटाने की व्यवस्था मजबूत करने के मामले में यह टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 और 19(1)(a) के तहत इंटरनेट तक पहुंच और उसका इस्तेमाल करना मौलिक अधिकार है। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, जबकि अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है। पीठ के सामने सवाल था कि क्या बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए इंटरनेट और सोशल मीडिया से पूरी तरह दूर रखा जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि उम्र के आधार पर बच्चों को इंटरनेट के अधिकार से पूरी तरह वंचित करना बेतुका होगा। बच्चों की सुरक्षा और स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोध में नहीं हैं; वे दोनों के हकदार हैं। अदालत ने यह भी कहा कि दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए इंटरनेट सीखने और जानकारी हासिल करने का एकमात्र साधन हो सकता है। विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए भी यह दूसरों से जुड़ने का अहम माध्यम है।

इंटरनेट मौलिक अधिकार है, फिर भारत में बार-बार क्यों बंद होता है?

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बीच भारत में इंटरनेट शटडाउन के आंकड़े भी अहम सवाल उठाते हैं। इंटरनेट शटडाउन का मतलब है सरकार द्वारा किसी इलाके में इंटरनेट सेवाएं बंद करना या उनकी पहुंच रोकना। डिजिटल अधिकारों पर काम करने वाली संस्था Access Now और #KeepItOn गठबंधन की 31 मार्च 2026 को जारी रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में दुनिया के 52 देशों में कम से कम 313 इंटरनेट शटडाउन दर्ज किए गए। इनमें म्यांमार में सबसे ज्यादा 95 और भारत में 65 मामले सामने आए। इस तरह भारत दुनिया में दूसरे और लोकतांत्रिक देशों में पहले स्थान पर रहा। हालांकि, भारत में शटडाउन की संख्या 2024 के 84 से घटकर 2025 में 65 हो गई। Access Now के अनुसार, 2016 से 2025 के बीच भारत में कुल 920 इंटरनेट शटडाउन दर्ज किए गए, जबकि दुनिया भर में यह संख्या 2,102 रही।

दुनिया में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर क्यों लग रही हैं पाबंदियां?

एक तरफ सुप्रीम कोर्ट बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखने के खिलाफ है, तो दूसरी तरफ कई देशों ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर उम्र के आधार पर रोक लगाने का रास्ता चुना है।

ऑस्ट्रेलिया: 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर रोक

ऑस्ट्रेलिया ने 10 दिसंबर 2025 से 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए कई प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अकाउंट रखने पर रोक लागू की। इसके तहत संबंधित कंपनियों को ऐसे बच्चों के अकाउंट रोकने के लिए उचित कदम उठाने होते हैं।

फ्रांस: 15 साल से कम उम्र के बच्चों पर प्रतिबंध

फ्रांस में नाबालिगों को सोशल मीडिया के खतरों से बचाने के लिए कानून बनाया गया है। संसद ने जुलाई 2026 में संबंधित विधेयक को मंजूरी दी और 24 अगस्त 2026 को कानून लागू करने की औपचारिक प्रक्रिया पूरी हुई।

ब्रिटेन: 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर रोक की योजना

ब्रिटेन सरकार ने जून 2026 में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की। सरकार के मुताबिक, इन सुरक्षा उपायों को 2027 के वसंत तक लागू करने की योजना है। इसके साथ बच्चों को नुकसान पहुंचाने वाले कुछ ऑनलाइन फीचर्स पर भी नियंत्रण लगाने की बात कही गई है।

फिलीपींस: संसद में विधेयक पर प्रक्रिया जारी

फिलीपींस में 12 अक्टूबर 2026 को संसद के निचले सदन ने 13 साल से कम उम्र के बच्चों की सोशल मीडिया पहुंच सीमित करने वाला विधेयक मंजूर किया। सीनेट ने इससे अलग और सख्त प्रस्ताव का समर्थन किया था। दोनों सदनों में सहमति और आगे की मंजूरी जरूरी थी, इसलिए इसे लागू कानून कहना सही नहीं होगा।

इन प्रतिबंधों का मकसद बच्चों को साइबर बुलिंग, ऑनलाइन शोषण, नुकसानदेह सामग्री और सोशल मीडिया के अत्यधिक इस्तेमाल से बचाना है। हालांकि, उम्र की जांच के लिए निजी जानकारी जुटाने से निजता को खतरा हो सकता है। बच्चे पाबंदियों से बचने के लिए कम सुरक्षित प्लेटफॉर्म अपना सकते हैं। साथ ही, सोशल मीडिया पर प्रतिबंध और पूरे इंटरनेट तक पहुंच रोकना दो अलग-अलग बातें हैं।

भारत में भी बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर बहस

भारत में भी बच्चों के इंटरनेट और सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर उम्र के आधार पर नियम बनाने की चर्चा तेज हुई है। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन की 6 अगस्त 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और गोवा जैसे राज्यों में इस तरह के प्रस्तावों पर विचार किया गया है।

कर्नाटक: राज्य सरकार ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने की घोषणा की थी।

आंध्र प्रदेश: राज्य में 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए प्रतिबंध और 13 से 16 साल के बच्चों के लिए अलग सुरक्षा उपायों पर विचार हुआ।

गोवा: यहां भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पाबंदियों और दूसरे सुरक्षा उपायों पर चर्चा हुई।

इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन की अगस्त 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, इन राज्यों में ऐसे प्रतिबंधों का कानून लागू नहीं हुआ था। केंद्र के स्तर पर भी उम्र तय करने, प्लेटफॉर्म की पहचान और बच्चों की निजता सुरक्षित रखने जैसे सवाल अहम हैं।

भारत में कितने इंटरनेट यूजर्स हैं?

बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर यह बहस ऐसे देश में हो रही है, जहां इंटरनेट यूजर्स की संख्या दुनिया में दूसरे स्थान पर है। Statista के अप्रैल 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में करीब 97.2 करोड़ इंटरनेट यूजर्स थे, जबकि TRAI के अनुसार मार्च 2026 के अंत तक इंटरनेट सब्सक्रिप्शन की संख्या करीब 109.3 करोड़ थी। दोनों में अंतर यह है कि यूजर्स लोगों की संख्या बताते हैं, जबकि सब्सक्रिप्शन इंटरनेट कनेक्शन की। इतने बड़े डिजिटल बाजार में इंटरनेट तक पहुंच का सवाल शिक्षा, रोजगार, कारोबार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता से भी जुड़ा है।

इंटरनेट पर बच्चों की सुरक्षा बनाम उनके अधिकार 

बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाना जरूरी है, लेकिन उन्हें इंटरनेट से पूरी तरह दूर करना इसका एकमात्र समाधान नहीं हो सकता। उम्र के आधार पर सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने के साथ-साथ प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करना, नुकसानदेह सामग्री हटाना और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा मजबूत करना भी जरूरी है। भारत के सामने चुनौती है कि बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए उनके शिक्षा, जानकारी और अभिव्यक्ति के अधिकारों की रक्षा कैसे की जाए। आखिरकार, मकसद बच्चों को इंटरनेट से दूर रखना नहीं, बल्कि इंटरनेट को उनके लिए सुरक्षित बनाना और हर व्यक्ति के इंटरनेट तक पहुंचने के अधिकार की रक्षा करना होना चाहिए