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निर्वाचन आयोग ने "पप्पु"को नहीं किया पास

गुजरात में निर्वाचन आयोग (ईसी) ने भारतीय जनता पार्टी के टेलीविजन चुनाव प्रचार अभियान में पप्पू शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। निर्वाचन आयोग को प्रचार अभियान में पप्पू शब्द पर आपत्ति है। उसे लगता है कि इसके जरिये कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को अप्रत्यक्ष तरीके से निशाना बनाया गया है और यह अपमानजनक है। आयोग ने इस संबंध में भाजपा को भेजे पत्र में कहा है, इस राजनीतिक प्रचार में इसका (पप्पू) इस्तेमाल नहीं होना चाहिए, समिति इस प्रचार में बदलाव की अनुशंसा करती है। इसमें भाजपा के नए प्रचार अभियान को प्रतिबंधित करने के लिए टेलीविजन नेटवर्क रूल्स 1994 का हवाला भी दिया गया है। ईसी के इस निर्णय के बाद राजनीतिक विवाद पैदा हो गया है। भाजपा इस निर्णय से खिन्न नजर आ रही है। भाजपा को आयोग की ओर से पहला पत्र 31 अक्टूबर को भेजा गया था, जिसके बाद पार्टी ने सात नवंबर को प्रचार सामग्री पर बैन के विरोध में अपील की थी। लेकिन भाजपा की तमाम कोशिशों के बाद भी निर्वाचन आयोग अपने रुख पर अड़ा रहा। माना जा रहा है कि भाजपा अब इस मामले को लेकर एक बार फिर से राज्य निर्वाचन आयोग में अपील कर सकती है। ईसी की आपत्ति का कड़ा विरोध करते हुए भाजपा ने कहा है कि इस प्रचार सामग्री में किसी का भी सीधे तौर पर नाम नहीं लिया गया है। पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा ने राज्य निर्वाचन आयोग की आलोचना करते हुए कहा कि, निर्वाचन आयोग ने पप्पू शब्द को आधिकारिक बना दिया और इसे राहुल गांधी का पर्याय बना दिया। जबकि नलिन कोहली निर्वाचन आयोग से ही इसका स्पष्टीकरण चाहते हैं कि आखिर क्यों उसने प्रचार सामग्री को प्रतिबंधित किया है? उन्होंने कहा कि मुझे समझ नहीं आता कि निर्वाचन आयोग आखिर पप्पू शब्द को राहुल गांधी से क्यों जोड़ रहा है? भाजपा और उसके समर्थकों की खीझ स्वाभाविक है। आखिर इतने बरसों में उन्होंने बड़ी मेहनत से अपने प्रचार तंत्र के जरिए राहुल गांधी के लिए पप्पू का किरदार गढ़ा था और अब गुजरात चुनाव के वक्त जब उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी, भाजपा इस किरदार का इस्तेमाल नहींकर पाएगी। भाजपा प्रवक्ता भले यह मासूम तर्क दें कि पप्पू का संबंध राहुल गांधी से नहीं है, लेकिन उनकी मासूमियत किसी के गले नहीं उतरेगी। अब देखने वाली बात यह है कि भाजपा की सोशल मीडिया पर सक्रिय रचनात्मक टीम अब कौन सा विशेषण लेकर आती है, जिससे राहुल गांधी का मजाक बनाया जा सके। वैसे यह पहली बार नहीं है कि अपने राजनीतिक विरोधी के लिए मजाक उड़ाने वाले नाम न गढ़े जाएं। राहुल गांधी को लंबे समय तक शहजादा या युवराज ही कहा जाता था। कांग्रेस विरोधी इसके जरिए वंशवाद पर निशाना साधना चाहते थे, लेकिन अब तो वामदलों को छोड़ कोई राजनीतिक पार्टी नजर नहीं आती, जहां अपने वंशबेल फलती-फूलती न हो। युवराज की उपयोगिता उतनी साबित न हुई तो राहुल गांधी को नाकारा या अयोग्य बताने के लिए पप्पू शब्द प्रचलन में ले आया गया। 10 साल पहले एक गाना खूब हिट हुआ था पप्पू कांट डांस साला। तो यह पप्पू शायद उसी से प्रेरित था। दिलचस्प बात यह है कि 2009 में ईसी ने मतदान के लिए लोगों को प्रेरित करने के पप्पू कांट वोट का विज्ञापन चलाया था। यानी आप में जागरूकता नहीं है तो आप पप्पू हो। कैडबेरी चाकलेट का एक विज्ञापन आता था, जिसमें अमिताभ बच्चन पप्पू पास हो गया का गीत गाते हैं। बाद में इसी पंक्ति पर कई गाने भी बने और एक हिंदी कामेडी फिल्म भी। कहने का आशय यह कि पप्पू कहकर किसी का मजाक उड़ाने का सिलसिला पिछले एक दशक से भारतीय समाज में चल ही रहा है। लेकिन राजनीति में इसके इस्तेमाल पर अब ईसी ने रोक लगाई है, जो सही कदम लगता है। यूं तो लोकतंत्र की राजनीति में विरोधियों पर तंज या कटाक्ष होना आम बात है। लेकिन इस पर कोई अंकुश न होने के कारण यह प्रवृत्ति निजी हमलों और चरित्रहनन तक जा पहुंची है, जो बिल्कुल गलत है। आप अपनी नीतियों, योजनाओं फैसलों से विपक्ष को मुंहतोड़ जवाब दें, तो राजनीति की मर्यादा बनी रहेगी। लेकिन आप किसी के व्यक्तित्व पर हमला करेंगे तो राजनीतिक मर्यादा को तार-तार होने में देर नहीं लगेगी। दुख की बात यह है कि भारतीय राजनीति में इस वक्त मर्यादा का पतन सबसे तेजी से हुआ है दरअसल भारतीय राजनीति के मैदान में जब से सोशल मीडिया का इस्तेमाल शुरु हुआ है, राजनीतिक दंगल के सारे नियमों को ताक पर रख दिया गया है। पप्पू के अलावा, फेेंकू, मफलरमैन, खुजलीवाल, चाराखोर जैसे शब्द राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी एक-दूसरे के लिए इस्तेमाल करते रहते हैं और ट्विटर, फेसबुक पर इन पर चुटकुलों की बाढ़ आ जाती है। स्कूल, कालेज में विद्यार्थी अपने सहपाठियों या शिक्षकों के लिए अक्सर ऐसे नाम गढ़कर कोडवर्ड की तरह उनका इस्तेमाल करते हैं। लेकिन उसमें बचपना होता है। क्या हमारे राजनेता देश संभालने की तैयारी इन बचकानी हरकतों के साथ करना चाहते हैं?

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सैक्स, सीडी और राजनीति

राजनीति संसद भवन और सचिवालयों से निकल कर गली और सड़कों से होती हुई कब बेडरूम तक पहुँच जाती है, अंदाज़ा नहीं लगता। राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता, शत्रुता में तब्दील हो चुकी है और राजनीति युद्ध बन चुका है। युद्ध में साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाने की परंपरा आदि काल से ही रही है। और अब यही नीति राजनीति में भी अपनाई जाने लगी है। राजनैतिक गलियारों में विपक्षियों के चरित्र हनन के लिए सैक्स का प्रयोग आम होने लगा है। सेक्स एक ऐसा मसाला है जिसका प्रयोग फिल्मों के बिज़नेस को आसमान तक पहुँचाने के लिए बॉलीवुड के बड़े बड़े फिल्मकार करते हैं। एक ऐसी लत है जिससे जीवन के एक कालावधि में शायद ही कोई व्यक्ति बचा हो और जिसके कारण पोर्न इंडस्ट्री लगातार फल फूल रही है। यद्यपि भारत में कानूनी रूप से वैध ऐसी इंडस्ट्री नहीं है लेकिन इस इंडस्ट्री को दुनिया में सर्वाधिक दर्शक अपने देश से ही मिलते हैं। खजुराहो का मंदिर तथा अजंता और एलोरा की गुफाएँ जिस देश के स्थापत्य कला का नमूना है, कामसूत्र जिस देश की रचना है; उस देश में सेक्स को लेकर लोगों ने काफी पूर्वग्रह पाली हुई है। किसी व्यक्ति ने अगर शादी किए बग़ैर सेक्स किया हो और लोगों को इसका पता चल जाए तो यह समाज उस व्यक्ति को ताउम्र सिर उठा कर नहीं चलने देती। एक धारणा बन जाती है कि वह व्यक्ति चारित्रिक स्तर पर हीन है। यह बात सब जानते हैं कि राजनीति धारणाओं का खेल है। लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं, यह अधिक महत्वपूर्ण है बजाय इसके कि आप क्या हैं? बस इसी बात का फायदा उठाते हुए कई बार चारित्रिक रूप से प्रतिद्वंद्वी को समाज के नज़र में गिराने के लिए सैक्स सीडी का प्रयोग होता रहा है। दिग्विजय सिंह से लेकर एन डी तिवारी तक सैक्स सीडी या फोटो लीक के पीड़ितों की सूची में हैं। इस सूची में हार्दिक पटेल का नाम जुड़ गया है। गुजरात के पाटीदारों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले हार्दिक बड़ी तीव्र गति से राजनीति के आसमान में उभरे। उम्र इतनी कम कि चुनाव भी नहीं लड़ सकते लेकिन ताक़त इतनी ज़्यादा कि भारत की सबसे बड़ी पार्टी ख़ौफ़ज़दा है। दरअसल, हार्दिक ने बीजेपी का वोटबैंक माने जाने वाले पाटीदारों को बीजेपी के ख़िलाफ़ लाकर खड़ा कर दिया है। नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद गुजरात में बीजेपी के पास कोई ऐसा चेहरा बचा नहीं है, जिसके दम पर चुनावों में जीत की गारंटी मिल सके। इसके अलावा केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों, विशेषत: जीएसटी के कारण छोटे व्यापारी जो बीजेपी के परंपरागत वोटर हैं, पार्टी से नाराज़ चल रहे हैं। इसके अलावा राहुल गाँधी भी इन चुनावों में अभूतपूर्व सक्रियता दिखा रहे हैं। पिछले दिनों सोशल मीडिया पर कहीं न कहीं उन्होंने बीजेपी को अच्छी चुनौती दी है। इन कारणों से गुजरात की सत्ता पर पिछले 20 वर्षों काबिज़ बीजेपी की नींद उड़ी हुई है। संभव है कि जिग्नेश, अल्पेश और हार्दिक को साधने के लिए बीजेपी ने हार्दिक के चरित्रहनन की कोशिश की हो। संभव है कि पॉर्न को बंद करने की बात करने वाली बीजेपी खुद राजनेताओं की सैक्स सीडी लाँच कर रही हो। पिछले दिनों हार्दिक पटेल ऐसा अंदेशा जता भी चुके थे। सवाल यह उठता है कि क्या बीजेपी इतना अपरिपक्व राजनीति कर सकती है? बेशक़ संभावनाएँ कम हों लेकिन मुमकिन ये भी है कि यह सीडी लीक हार्दिक पटेल का सियासी दाँव हो। राजनीति में संभावनाओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। ख़ैर, सच और झूठ का फैसला भविष्य के गर्भ में छिपा है। एक बात तो तय है कि दोषी चाहे जो भी हो, पीड़ित राजनीति, लोकतंत्र और आम जनता ही हैं।

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