बिहार में जुगाड़ की नाव पर तैरती ज़िंदगी!

अररिया शहर से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग-57 पर कल तक जहाँ वाहनों की चहल-पहल होती थी, वहां आज दूर तक पानी भरा है और लोग जुगाड़ की नावों के सहारे ज़िंदा बचे रहने का संघर्ष कर रहे हैं. ऐसे ही एक जुगाड़ के सहारे रामपुर-मोहनपुर गाँव के किसान संजय अपने कुछ साथियों के साथ महात्मा गाँधी स्कूल में चल रहे ज़िला प्रशासन के आपदा कंट्रोल रूम में आए. सरकार से उनको सहायता के रूप में पॉलिथीन शीट और अनाज मिलने की आशा थी, लेकिन उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा. करीब 35 साल के संजय कहते हैं कि हम लोगों को मदद की बड़ी आस थी, लेकिन हमें यहाँ से भगा दिया गया. पांच दिन के भीतर गाँव के पांच लोगों की बाढ़ से मौत हो चुकी है. वहां कुछ लोग पक्के मकान की छत पर तो कुछ पेड़ पर रहने को मजबूर हैं. वहीँ राष्ट्रीय राजमार्ग पर शरण लेने वाली खरईया बस्ती की इंदु देवी कहती हैं कि गाँव में गर्दन तक पानी भरा है इसलिये हम लोग यहाँ आए हैं. प्रशासन की नाकामी मोहम्मद साबिर अंसारी भी हाइवे पर शनिवार से हैं. उनके अनुसार पानी सूखेगा तब ही न गाँव जाएंगे. भीषण बाढ़ से से जूझ रहे अररिया जिले के अलग-अलग हिस्सों के लोगों की बातों से लगता है कि यहाँ कि नारकीय स्थिति को नियंत्रित करने और पीड़ितों को राहत देने में प्रशासन नाकाम साबित हो रहा है. ग्रामीणों के अनुसार लोगों के राहत कार्य में जो नावें लगाईं गई हैं, वे नौ प्रखंडों की ज़रूरत से काफी कम है. राहत शिविर ग्रामीण बताते हैं कि अररिया जिले में जनप्रतिनिधियों के सहारे प्रशासन काम कर रहा है. वहीँ ग्रामीणों से अलग अररिया के ज़िलाधिकारी हिमांशु शर्मा दावा करते हैं कि हरेक स्कूल में एमडीएम के चावल और डीलर्स के माध्यम से राहत शिविर चलाए जा रहे हैं. उन्होंने कहा, "सामुदायिक किचेन स्थानीय मुखिया के माध्यम से कार्यरत हैं. हम जोकीहाट, पलासी, कुर्साकाँटा और सिकटी प्रखंड तक नहीं पहुँच पा रहे हैं. वहां यातायात और संचार बहाल करना हमारी सबसे बड़ी चुनौती है. हम एक- दो दिनों में उसे बहाल कर लेंगे." पहले से तैयारी वहीँ बाढ़ के चलते हुई मौंतों पर वे कहते हैं कि करीब 20 लोग इसके शिकार हुए है. दूसरी ओर सामाजिक कार्यकर्ता आशीष रंजन कहते हैं कि बाढ़ पूर्व तैयारी से जुड़ी प्रक्रिया की चिट्ठी अप्रैल, 2017 में जारी कर दी गई थी, लेकिन प्रशासन की ओर से बाढ़ की संभावना पर पहले से कोई तैयारी नहीं की गई. उन्होंने बताया, "बाढ़ का पानी शहर और ज़िलाधिकारी के आवास तक पहुंच गया. वहीँ आम लोगों का सड़क पर आश्रय लेना भी सब कुछ बता देता है. प्लास्टिक शीट और मवेशियों को चारा तक नहीं मिल पा रहा है. सामुदायिक किचेन कहीं नहीं चल रहा है तो ड्राई राशन कहीं-कहीं दिया जा रहा है. मुझे लगता है की इस तरह की बाढ़ के लिए प्रशासन बिल्कुल तैयार ही नहीं था." ताजा हालात पटना से स्थानीय पत्रकार मनीष शांडिल्य ने बताया कि बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक बुधवार को सबसे ज्यादा मौतें सीतामढ़ी और पूर्णिया जिले में हुईं. सीतामढ़ी में छह तो पूर्णिया में पांच लोगों की मौत बाढ़ के चपेट में आने से हुई. बाढ़ से प्रभावित जिलों की संख्या भी बढ़कर 16 हो गई जहां की कुल 73 लाख की आबादी बाढ़ से घिरी है. इन जिलों के 3867 गांव बाढ़ से घिरे हुए हैं. राज्य सरकार द्वारा अभी तक करीब पौने तीन लाख प्रभावित लोगों को निकालकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया है. इनमें से बीते चैबीस घंटों में करीब 24 हजार लोगों को सुरक्षित निकाला गया है. एनडीआरएफ की 27 और एसडीआरएफ की 16 टीमें 206 बोट्स के सहारे बचाव के काम में लगी हैं. बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए राज्य सरकार अभी 504 राहत शिविर चला रही है जिसमें करीब एक लाख सोलह हजार लोगों ने शरण ली है.