भारत छोड़ो आंदोलन में कहां था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ?

भारत छोड़ो आंदोलन के 75 साल पूरे होने पर बुधवार को संसद के दोनों सदनों का विशेष सत्र बुलाया गया. ब्रिटिश राज से आज़ादी की लड़ाई में इस आंदोलन की बड़ी भूमिका थी. महात्मा गांधी और कांग्रेस पार्टी इस आंदोलन के सूत्रधार थे. एनडीए सरकार ने इस पर विशेष सत्र बुलाया तो क्या इसके क्या राजनीतिक मायने हो सकते हैं, इस पर बीबीसी हिंदी के रेडियो एडिटर राजेश जोशी ने हैदराबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर ज्योतिर्मय शर्मा से बात की. भले ही मौजूदा दौर की कोई राजनीतिक पार्टी क्विट इंडिया मूवमेंट का हिस्सा रही हो या न रही हो, उसकी विरासत तो सभी ने गंवा दी है. जहां तक संघ परिवार का सवाल है, आज़ादी की लड़ाई में उनकी कोई बड़ी भूमिका नहीं थी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1925 से हमेशा ये माना कि स्वतंत्रता की लड़ाई केवल एक राजनीतिक लड़ाई है. और राजनीति से संघ को अभी हाल में नहीं, बल्कि क़रीब-क़रीब साल 2000 तक राजनीति से चिढ़ रही थी. राजनीति को संघ ने तुच्छ माना है, निम्न माना है. उन्होंने ये माना है कि जब तक समाज का और समाज में रहने वाले लोगों का हिंदू संस्कृति के माध्यम से उद्धार नहीं हो, तब तक आज़ादी केवल राजनीतिक आज़ादी बनकर रह जाएगी. फ़ासले तो सब जगह है. जिसको हम आधिकारिक राष्ट्रवाद कहते हैं, जो 1947 में आकर एक तरह से हमारा राष्ट्रवाद बन गया. उसमें भी बड़े फ़ासले हैं. उस राजनीतिक लड़ाई में दलित कहां हैं, आदिवासी कहां है, महिलाएं कहां हैं? गांधी के आंदोलन में महिलाओं का योगदान था पर महिलाओं की सशक्त आवाज़ तो उस राजनीतिक राष्ट्रवाद में भी नहीं थी. इस लिहाज से ये फ़ासले वाली बात अलग बात है. हम आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बात इसलिए कर रहे हैं कि आज की जो युवा पीढ़ी है और जिस तरह से प्रौपेगैंडा हो रहा है, वो सोचते हैं कि इस देश का निर्माण या तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वारा हुआ है या फिर राष्ट्र ही पैदा हुआ है 2014 से. इतिहास का सत्य आजकल केवल संघ परिवार के साथ है. ऐसा प्रॉपेगैंडा चल रहा है. गोरी और गजनी से इतिहास शुरू करने वाले पाकिस्तान की कई ऐसी बेवकूफ़ियां हैं जिनकी हम यहां हिंदुस्तान में नक़ल कर रहे हैं. आज का नौजवान क्या चाहता है. हमारा शिक्षा का स्तर गिर रहा है. स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर गिर रहा है. मानव विकास के हर पैमाने पर गिरावट हो रही है. इतिहास किसका ज़्यादा सही था, किसका ज़्यादा ग़लत था, उसमें हम पड़े हुए हैं. इससे देश का कुछ होने वाला नहीं है. लोग इन बातों में आ जाते हैं, ये बड़े दुख की बात है. उनका मानना था कि राजनीति से कुछ नहीं हो सकता है. आज से आठ या 10 साल पहले सुदर्शन जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक थे और वाजपेयी की सरकार थी, तब उन्होंने एक भाषण में महाभारत के एक श्लोक के हवाले से कहा था कि राजनीति तो वेश्या की तरह है. एक ही आज़ादी तो बची है आज कल देश में, वो गाली देने की है और बाकी हमारी सिविल लिबर्टीज़ पर चोट हो रही है. जहां तक किसी विचार को अपनाने की बात है, अच्छे विचार अपनाने में दिक़्क़त नहीं है. लेकिन 'अपना बताना' जो है, वो ज़मीन हथियाने जैसा है. आपने कहीं जाकर अपना खेमा डंडे के बल पर गाड़ दिया. दोनों चीज़ें अलग हैं. सरदार पटेल, भगत सिंह और आंबेडकर किसके हैं. ये जो प्रात:स्मरणीय शब्द है वो गोलवलकर ने गांधी के लिए इस्तेमाल किया था. 1948 के बाद. उनका एक निबंध का शीर्षक है प्रात:स्मरणीय गांधी जी. तो ये अपना बताने की परंपरा आज कल की नहीं है, ये बहुत पुरानी है.