दिल्ली में बिना पटाखे वाली दीपावली का मतलब

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में इस साल दिवाली के मौके पर पटाखों की बिक्री पर पाबंदी लगाकर जहां सांस लेने में राहत का उपाय किया है वहीं धार्मिक और व्यावसायिक नज़रिये से विवाद भी पैदा हो गया है। दिवाली के मौके पर प्रदूषण की वैश्विक राजधानी बन जाने वाली दिल्ली को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट कई वर्षों से मुस्तैद है और उसने पटाखें फोड़ने के नियम और समय निर्धारित कर रखे हैं। पिछले साल भी सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों पर पाबंदी लगाई थी लेकिन, वह आदेश दिवाली के बाद की गतिविधियों के लिए था। इस साल ऐन दिवाली के मौके पर कुछ बच्चों की याचिका के आधार पर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने यह जानने के लिए पटाखों की बिक्री प्रतिबंधित करने का निर्णय लिया है कि इससे दिल्ली के वातावरण पर कितना फर्क पड़ेगा। इस पाबंदी के ठीक पहले अदालत ने एक पटाखा उत्पादक की याचिका पर अस्थायी निर्माण और बिक्री की अनुमति दे दी थी। बाद में बच्चों की तरफ से आई पुकार पर ध्यान देकर यह कहते हुए कठोर फैसला लिया गया कि कानून और समाज के बीच अंतर नहीं रहना चाहिए। निश्चित तौर पर दिल्ली और एनसीआर के वृद्ध और बच्चे इस क्षेत्र के प्रदूषण से परेशान हैं और दिवाली के मौके पर दिल्ली दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बन जाता है। इसकी तस्वीरें भी उपग्रहों से आती रही हैं और प्रदूषण मापने की इकाई पीएम भी तीन गुना बढ़ी पाई गई। इसके बावजूद दिवाली के मौके पर पटाखे फोड़ने की लंबी परम्परा है और उसका एक धार्मिक-सांस्कृतिक पक्ष भी है। यही कारण है कि कई तर्कवादी नागरिकों ने भी इस पक्ष की ओर ध्यान दिलाया है। दूसरा पक्ष व्यापारियों और उससे जुड़े कर्मचारियों का है। दुकानों पर पचास लाख किलो पटाखे बिक्री का इंतजार कर रहे हैं और यह कारोबार 1000 करोड़ रुपए का है। अगर पहले अस्थायी अनुमति न मिली होती तो वे शायद ही इतना भंडार जमा करते। विडंबना यह है कि पटाखे चलाने पर रोक नहीं है। ऐसे में लोग पहले से खरीदे पटाखे चला सकते हैं या एनसीआर के बाहर से खरीदकर ला सकते हैं। समाज को बेहतर बनाने के लिए न्यायालय का प्रयोग करना स्वागत योग्य है लेकिन, अगर वह जोर का झटका धीरे से लगाए तो समाज को संभलने और सुधरने का मौका मिलता है।