“गाँधी के विरोधियों पुजारियों का मेल है, राजनीति साँप और नेवले का खेल है”

2009 की लुधियाना रैली। लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में एनडीए का सबसे बड़ा शक्ति प्रदर्शन। बीजेपी शासित तमाम प्रदेशों के मुख्यमंत्री, बीजेपी के वरिष्ठ नेता और गठबंधन के प्रमुख नेताओं को रैली में बुलाया गया। मसलन, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी आमंत्रण मिला। लेकिन नीतीश ने जाने से मना कर दिया। कारण थे – नरेंद्र मोदी। नीतीश, नरेंद्र के साथ मंच सांझा नहीं करना चाहते थे। गठबंधन की मजबूरियों के चलते शरद यादव से जाने का आग्रह किया। एनडीए नीतीश कार की उपस्थिति चाहता था। सो, मान मनोव्वल हुई। अरुण जेतली ने फोन पर बात की और फिर संजय झा को नीतीश को मनाने की जिम्मेदारी मिली। संजय झा ने ऩीतीश को कार्यक्रम में जाने के लिए मना लिया। नीतीश गए, लेकिन हुआ वही जिसका उन्हें अंदेशा था। सांप्रदायिकता को हमेशा गरियाने वाले नीतीश के हाथ को उसके सबसे बड़े पुजारियों में से एक नरेंद्र मोदी ने अपने हाथों में पकड़कर जनता की तरफ उठाया। नीतीश कुछ सेकेंड्स की ये घटना जब तक समझ पाते, तब तक ये घट चुकी थी। वापिस आते हुए एक बार को संजय झा पर उनका गुस्सा फूटा और उन्होंने कहा कि “देखना यही फोटो सारे अखबारों में छपेगी”। संजय को अब नीतीश की बातें समझ आ रही थी। हुआ बिल्कुल वैसा, जैसा नीतीश ने कहा था। वो फोटो छपी थी जिसमें साँप और नेवले ने एक दूसरे का हाथ थामा हुआ था। नीतीश कुमार किसी भी सूरत में नरेंद्र मोदी के साथ नहीं दिखना चाहते थे। कारण – नरेंद्र मोदी की सांप्रदायिक विचारधारा। सन 2010 में बिहार बाढ़ में डूब रहा था। लोगों में हाहाकार मचा हुआ था। तबाही का मंजर था। इसी दौरान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत चेहरा बनने को बेताब नरेंद्र मोदी ने बिहार को 5 करोड़ रुपए का चेक सहायता स्वरूप दिया। राज्य के हित में नीतीश ने नरेंद्र की सहायता स्वीकार कर ली। इसी दौरान बीजेपी की राष्ट्रीय एक्ज़ीक्यूटिव मीट पटना में आयोजित होनी थी। नीतीश उस दौरान पटना में थे नहीं। खैर, उन्होंने अपने आवास पर तमाम बीजेपी नेताओं के लिए डिनर की योजना बनाई और आमंत्रण कार्ड छपवाए। लेकिन पटना आते ही उन्होंने दो बड़े अखबारों के पहले दो पेज़ पर जो विज्ञापन देखा उससे हिल गए। डिनर कैंसल किया और सहायता चैक लौटा दिया। बाद में नरेंद्र मोदी के बढ़ते वर्चस्व और बीजेपी के मोदीमय हो जाने के बाद नीतीश ने सत्ता छोड़ते हुए गठबंधन से किनारा कर लिया। नीतीश स्वाभिमान और सिद्धांतों से समझौता नहीं करते- ऐसी एक छवि बनी। नीतीश ने लालू के द्वारा उजाड़े हुए बिहार को जिस तरह से बसाया वो काबिलेतारीफ है। नीतीश ने धरातलीय स्तर पर कैसा काम किया वो केवल वही व्यक्ति जान सकता है जिसने बिहार के निजी बसों में 5 किमी की दूरी आधे घंटे में तय की हो और सफर के दौरान कई बार अपने अपने भगवान से जान की दुआ मांगी हो। नीतीश का काम वही व्यक्ति जान सकता है जिसने दवाई की छोटी छोटी शीशीयों के डिबिया में पढ़ाई को हो। नीतीश का काम वही व्यक्ति जान सकता है जो शराब के कारण रोज़ाना घर में होने वाले झगड़ों का मूक शिकार रहा हो। नीतीश बिहार के अन्य नेताओं से मीलों आगे हैं। कम से कम मौज़ूदा दौर का कोई बिहारी नेता उनके आस पास भी नही पहुँचता। नीतीश का स्वाभिमान, उनकी बेबाकी और उनका आत्मविश्वास बहुत से बिहारवासियों की ताकत था। लेकिन ये ताकत पिछले विधानसभा चुनावों के बाद से लगातार कम होता जा रहा है। विधानसभा चुनावों के बाद भ्रष्टाचार की प्रतिमूर्ति लालू प्रसाद यादव के साथ हाथ मिलाना बहुत से नीतीश प्रेमियों को नागवार गुजरी। नीतीश के तेवर और स्वभाव को देखते हुए आशंका जरूर थी की सरकार अपने तय पाँच साल पूरे नहीं कर पाएगी। आशंकाएँ बिल्कुल ठीक साबित हुई। लगभग 20 महीने तक चली सरकार 2.5 घंटों में गिर गई। इस्तीफा देते हुए नीतिश ने कहा कि वो अपनी अंतर्आत्मा की आवाज के अनुरूप काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अपने मूल सिद्धांतों से समझौता नहीं कर सकते। ठीक है, मानते हैं और चाहते भी नहीं कि नीतीश जैसे नेता अपने सिद्धांतों की तिलांजलि दे दें। लेकिन एख सिद्धांत की याद आते ही आप अपने अन्य सिद्धांतों को भूल जाएँ- ये बात हजम नहीं होती। जिन मोदी को लेकर आपने अपना पुराना गठबंधन तोड़ा था, आज बीजेपी में उनके सिवा कुछ नहीं। बीजेपी और मोदी एक दूसरे के पर्याय हो चुके हैं। मोदी के अतिरिक्त बीजेपी में कुछ और न तो दिखता है न ही बीजेपी दिखाना चाहती है। आरजेडी का साथ छोड़ने का आपका फैसला सिर आँखों पर लेकिन बीजेपी से हाथ मिलाने के आपके फैसले को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। कम से कम लोकतंत्र के वास्ते। आखिर हम ये कैसे मान लें कि सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ लड़ने वाले, सुशासन की बातें करने वाले और विपरीत हवाओं में भी बिजली की सी रफ़्तार रखने वाले नीतीश उम्र के साथ हौसलों से भी बूढ़े हो गए हैं। सत्ता छोड़ देने से लोग अप्रासंगिक नहीं हो जाया करते। गाँधी जी के विचारधारा की बात करने वाले नीतीश का सत्तामोह में फँसा होना दुर्भाग्यपूर्ण लगता है।