असहिष्णुता और बहुसंख्यकवाद से पैदा हुआ है देश की आत्मा को खतरा

सत्तर साल पहले 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ब्रिटिश साम्राज्य से भारत के स्वतंत्र होने की घोषणा की। नेहरू ने कहा, ‘इतिहास में ऐसे क्षण दुर्लभ होते हैं जब हम पुराने से नए में जाते हैं, जब एक युग खत्म होता है और लंबे समय से दमित किसी राष्ट्र की आत्मा को अभिव्यक्ति मिलती है।’ उसके साथ ही देश ने शासन में उल्लेखनीय प्रयोग की शुरुआत की, जो आज तक जारी है। यह ऐसा प्रयोग था, जो विंस्टन चर्चिल को अकल्पनीय लगता था। एक बार वे इस विचार को खारिज करने के लहजे में बोले थे, ‘भारत तो सिर्फ भौगोलिक अभिव्यक्ति है। यह भूमध्यरेखा से ज्यादा सिंगल कंट्री नहीं है।’ चर्चिल शायद ही कभी भारत के बारे में सही ठहरे हों। लेकिन, यह सही है कि विभिन्न जातीय समूहों. एक-दूसरे को समझने में आने वाली भाषाओं की प्रचूरता, भौगोलिक स्थितियों मौसम की कई किस्मों, धर्म सांस्कृतिक प्रथाओं की विविधता और आर्थिक विकास के विषम स्तरों के मामले में कोई देश भारत से तुलना नहीं कर सकता। प्राय: कुछ मजाक के रूप में इस खासियत का उल्लेख किया जाता है कि, ‘भारत के बारे में आप जो भी कह सकते हैं, तो उसका उलटा भी सच है।’ भारत के बारे में हर सच का खंडन किसी दूसरे सच से किया जा सकता है। सच तो यह है कि भारत के बारे में आप सिर्फ बहुवचन में ही बात कर सकते हैं। हम घिसेपिटे जुमले का प्रयोग करें तो कहेंगे कि यहां एक साथ कई भारत मौजूद हैं। सबकुछ असंख्य स्वरूपों में मौजूद है। कोई सर्वसम्मत मानक नहीं है, कोई तय रूपरेखा नहीं है, चीजों को देखने-करने का कोई ‘एक रास्ता’ नहीं है। यहां तक की देश के ध्येय वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ को भी कई तरह से समझा जा सकता है। भारत कम से कम 1.30 अरब सत्यों का घर है। यही विविधता और जटिलता है, जिसके कारण ब्रिटिश इतिहासकार ईपी थॉम्पसन भारत के बारे में यह कहने पर मजबूर हुए, ‘शायद दुनिया के भविष्य के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण देश है।’ वे इसे स्पष्ट करते हैं, ‘दुनिया की सारी धाराएं इस समाज में प्रवाहित होती हैं..ऐसा कोई विचार नहीं है, जो पश्चिम या पूर्व में सोचा जा रहा हो और वह किसी भारतीय मस्तिष्क में सक्रिय हो।’ यह देश जिस तरह अपनी व्यवस्था चलाता है उसमें इसकी असाधारण बहुलता को मान्यता मिलती है। यहां सारे समूह, आस्थाएं, स्वाद और विचारधारा जीवित हैं और उनकी अपनी जगह है। जब ज्यादातर विकासशील देशों ने राष्ट्र निर्माण आर्थिक विकास के लिए तानाशाही का मॉडल अपनाया, तब भारत ने बहुदलीय लोकतंत्र चुना। यह लोकतंत्र कितना ही स्वैच्छाचारी, शेखी बघारने वाला, भ्रष्ट और अक्षम लगता हो लेकिन, सारे तनावों और 22 माह के आपातकाल के बावजूद फलता-फूलता रहा है। कई लोगों को तो आज भी यह अराजक और बेमेल-सा देश लगता है। लेकिन, अनोखी विविधता के कारण यह ऐसी साहसिक यात्रा है, जिसमें सारे विकल्प खुले हैं और सबकुछ संभव है। परिणाम स्वरूप जो राष्ट्रीय पहचान सामने अाती है वह दुर्लभ प्रजाति है। ज्यादातर जैसा होता है वैसा यह भाषा आधारित देश नहीं है। भारत में 23, संभव है 35 भाषाएं हैं, यह इस पर निर्भर है कि आप संविधान की मानते हैं या भाषाविदों की। यह भूगोल पर आधारित नहीं है। पर्वतों और समुद्र से बने उपमहाद्वीप का नैसर्गिक भूगोल तो 1947 के विभाजन में बंट गया। किसी नस्ल या जातीय समूह पर आधारित भी नहीं है। भारतीय होने का मतलब किसी एक नस्ल का होना नहीं है। इसके उलट जातीयता से देखें तो कई भारतीय हमवतनों की बजाय विदेशियों से मिलते हैं। भारतीय पंजाबी और बंगालियों की समानता क्रमश: पाकिस्तानी बांग्लादेशियों से ज्यादा मिलते हैं। आखिर में भारतीय राष्ट्रवाद धर्म पर भी आधारित नहीं है। देश मानव जाति को ज्ञात सारे धर्मों का घर है और हिंदू धर्म का तो कोई स्थापित संगठन है और कोई हायरार्की है पर एक जैसी आस्था या आराधना का तरीका जरूर है, जो हमारी विवधता भी बताता है और समान सांस्कृतिक विरासत भी। भारतीय राष्ट्रवाद तो एक विचार पर आधारित है : एक ऐसी शाश्वत भूमि, जो प्राचीन सभ्यता से निकली है, साझा इतिहास से जुड़ी है और बहुलतावादी लोकतंत्र से बनी हुई है। यह अपने नागरिकों पर कोई संकुचित धारणा नहीं थोपता। आपमें एक साथ कई बातें हो सकती हैं। आप अच्छे मुस्लिम हो सकते हैं, एक अच्छे केरल वासी हो सकते हैं और इसके साथ एक अच्छे भारतीय भी हो सकते हैं। जहां फ्रायडवादी ‘मामूली मतभेदों के मोहवाद’ से निकली भिन्नताओं की बात करते हैं, भारत में हम महत्वपूर्ण मतभेदों की समानता का जश्न मनाते हैं। यदि अमेरिका उबलता कढ़ाह है तो भारत थाली है, अलग-अलग बाउल में व्यंजनों का शानदार चयन। प्रत्येक का स्वाद अलग, दूसरों में मिल ही जाए यह भी जरूरी नहीं लेकिन, वे एक-दूसरे के पूरक जरूर हैं। सब मिलकर एक संतुष्ट करने वाला भोज निर्मित करते हैं। इस तरह भारत का विचार यानी कई जन-समूहों को गले लगाना है। यह ऐसा विचार है कि जाति, नस्ल, रंग, संस्कृति, खान-पान, वेशभुषा और रीति-रिवाजों में गहराई से विभाजित लोग भी एक लोकतांत्रिक सर्वसहमति पर एकजुट हो सकते हैं। वह यह कि हर किसी को केवल असहमत होने के जमीनी कायदों को मानना है। बिना सर्वसहमति के कैसे काम चलाएं इस पर सर्वसहमति ने ही भारत को पिछले 70 वर्षों में फलता-फूलता रखा है। जबकि इसने ऐसी चुनौतियों का भी सामना किया है, जब कई लोगों ने इसके बिखरने का अनुमान व्यक्त कर दिया। भारत के संस्थापकों ने अपने सपनों का संविधान लिखा। हमें उनके आदर्शों का पासपोर्ट दिया गया है। लेकिन, आज उन आदर्शों को बढ़ती असहिष्णुता और उत्तरोत्तर आक्रामक होते बहुसंख्यकवाद से खतरा पैदा हो गया है। हम सब भारतीयों को समावेशी, बहुलतावादी, लोकतांत्रिक और न्यायपूर्ण भारत के प्रति फिर से प्रतिबद्ध होना चाहिए। उस भारत के प्रति जिसे स्वतंत्र करने के लिए महात्मा गांधी ने संघर्ष किया।