राजनीतिक दखल और सामाजिक संरचना ने बढ़ाई डेरों की ताकत

पंजाब-हरियाणा में माहौल तनावपूर्ण है। डेरा प्रमुख के हक में पहले कुछ जातीय संगठन आगे आए अब नामधारी समुदाय के प्रमुख ने भी समर्थन का ऐलान कर दिया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि डेरा सच्चा सौदा डेढ़ दशक में अपने श्रद्धालुओं की तादाद को करोड़ों तक पहुंचाने में कामयाब रहा है। वोट की खातिर उम्मीदवार डेरों में जाते हैं करीब ऐसा ही तजुर्बा अन्य डेरों ने भी किया। अपने-अपने डेरों में भक्तों-श्रद्धालुओं को बहुतायत में जोडऩे में कामयाब रहे हैं। डेरों ने भी अपनी इस ताकत का इस्तेमाल वोट बैंक के तौर पर करने में कोई कंजूसी नहीं बरती। करीब हर डेरे के दर पर चुनाव के समय छोटे-बड़े नेता, उम्मीदवार वोट की खातिर पहुंच जाते हैं। डेरे भी अपने श्रद्धालुओं की तादाद को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं। हालांकि चुनाव में डेरों का आधार किसी ही प्रत्याशी या दल के लिए फायदेमंद साबित हो पाता है। इसलिए बढ़ा डेरों का दायरा डेरों की यह ताकत अचानक ही नहीं बढ़ी है। पंजाब-हरियाणा में डेरों की ओर एक बड़े वर्ग के झुकाव का एक बड़ा कारण परंपरागत हिंदू व सिख धर्म से इस वर्ग का मोह भंग होना रहा है। बात चाहे राधा स्वामी सत्संग ब्यास की हो या फिर आशुतोष महाराज के दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की, चाहे रामपाल के सतलोक आश्रम के बाबा रामपाल हों या डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह। हर डेरे या आश्रम ने उस वर्ग पर फोकस रखा जो हिंदू धर्म के कर्मकांड का बोझ सहने में अक्षम था और या फिर जिसे हिंदू व सिख धर्म में वह अपनापन नहीं मिला जैसा अन्य उच्च जातियों को हासिल था। खास बात यह भी है कि इन डेरों के साथ चाहे समाज का एक बड़ा तबका जुड़ा हो मगर इनमें से अधिकांश डेरों के प्रमुख व कर्ता-धर्ता समाज के उच्च वर्ग से ही रहे हैं।