देश की जीवन रेखा को खंडित करता खतौली रेल हादसा

कलिंग उत्कल एक्सप्रेस की दुर्घटना ने फिर साबित कर दिया है कि भारतीय शासक वर्ग 21वीं सदी और नया भारत का नारा उछालने में भले तेज हो लेकिन, जमीन पर काम करने में बेहद लचर है। खतौली के पास जिस जगह ट्रेन पटरी से उतरी वहां काम चल रहा था और नियमपूर्वक गाड़ी की गति 15 से 20 किलोमीटर प्रतिघंटे होनी चाहिए थी लेकिन, वह सौ किलोमीटर की गति से दौड़ रही थी। ऐसी लापरवाही में हादसा होना ही था। हादसा हो तो जनधन की न्यूनतम हानि हो इसकी भी व्यवस्था नहीं थी क्योंकि, गाड़ी का इंजन और डिब्बे पुरानी शैली के थे और डिब्बों में एंटी-क्लाइम्बिंग यंत्र नहीं लगा था। ऐसे में एक के ऊपर एक 14 डिब्बे चढ़ गए, जिससे 23 लोगों की जान गई और सौ से ज्यादा घायल हुए। हादसा क्यों हुआ और भविष्य में दोहराव रोकने के लिए क्या किया जाए, इस बारे में रिपोर्ट आएगी लेकिन, उस पर अमल होने की उम्मीद कम ही है, क्योंकि निजीकरण के इंतजार में चल रहे रेलवे विभाग में न तो निवेश हो रहा है और न ही उसके पास पर्याप्त कर्मचारी हैं। श्वेत-पत्र में रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने स्वीकार किया था कि रेलवे के पास संसाधनों का अकाल है। जबकि मौजूदा सरकार ने नीतियों को कांग्रेसी प्रभाव से मुक्त करने के लिए अलग से पेश होने वाले रेल बजट को आम बजट के साथ मिला दिया है। सरकार ने आश्वासन दिया था कि वह ट्रेड यूनियनों के प्रभाव में काम कर रहे रेलवे विभाग को नाकारापन से छुटकारा दिलवाएगी और उसकी जरूरतों का पूरा ख्याल करेगी, लेकिन मौजूदा हादसे ने सरकार के इस दावे की कलई खोल दी है और यह साबित किया है कि सत्ता और आर्थिक संसाधनों के केंद्रीकरण से रेलवे जैसी विशाल परिवहन प्रणाली का उद्धार नहीं होने वाला है। यही वजह है कि कांग्रेस मांग कर रही है कि सुरेश प्रभु के तीन साल के कार्यकाल में 27 बड़े हादसे हुए हैं और उन्हें इसके लिए जवाबदेह माना जाना चाहिए। एक तरफ सरकार अपनी प्राथमिकता में सुरक्षा सबसे ऊपर रखती है तो दूसरी तरफ रेलवे में जरूरत के लिहाज से सिर्फ 67 प्रतिशत कर्मचारी ही उपलब्ध हैं। रेलवे के आधे से ज्यादा हादसे डिब्बों के पटरी से उतरने के कारण होते हैं और उसकी बड़ी वजह स्टाफ की कमी, नाकामी और मशीनी खराबियां होती हैं। रेलवे भारत की जीवन रेखा है लेकिन अगर हादसे कम नहीं हुए तो वह रेखा बार-बार खंडित होने के लिए अभिशप्त रहेगी।