कर्ज और बीमा तले कृषि और किसान

बचपन में भारत पर लिखे जाने वाले लेखों को याद कीजिए, जिसमें पहली लाइन अक्सर यही होती है की "भारत एक कृषि प्रधान देश है"। और इसके बाद भारत का दर्शन किजिए। आपको पता लग जाएगा की भारत के किसान को अछूत बना दिया गया है।

अगर ध्यान से देखा जाए तो वर्तमान में एक नई वर्ण व्यवस्था दिखाई देती है। जिसमें ब्राम्हण, वैश्य, क्षत्रीय और शूद्र को नेता, पुंजिपती, धार्मिक ठेकेदार और मध्यमवर्गीय नागरिक के समानांतर देखा जा सकता है। और अगर डॉ आंबेडकर के नजर को अपनाया जाए तो किसान उस शूद्र के समान है जिसे इन चारों वर्णो में से किसी में स्थान नहीं दिया गया है। और कृषि मैला उठाने के काम कि तरह। जिसे करने वाले को इंसान का दर्जा नहीं दिया गया है।

कृषि को नजरंदाज करने से हम किस दिशा में अग्रसर हो रहे हैं, यह बात समझनी बहुत जरूरी है। एक समय में भारत की 70% से ज्यादा आबादी कृषि पर निर्भर करती थी। और आज वह संख्या 50% के करीब आ चुकी है। यह प्रतिशत अच्छा है या बुरा यह भी समझना बहुत जरूरी है। आदि काल से ही कृषि भारत की मुख्य आर्थिक आधार रही है। तो यह बात तो स्वीकार करना होगा की हमने अन्य आर्थिक आधारो पर ज्यादा ध्यान देने के चक्कर में कृषि को दरकिनार किया है। तभी यह प्रतिशत कम हुई है। यह एक सवाल उठता है, हमने जिन दुसरे क्षेत्रों को आर्थिक आधार बनाना शुरू किया वह हमें महज मजदूर बना रही है या स्वामी? क्योंकि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था कि मजबूती तभी सुनिश्चित हो सकती है जब वहां की अर्थजगत का स्वामित्व वहां के सरकार या नागरिकों के पास हो। हिंदुस्तान में कृषि एक मुख्य आर्थिक आधार तो है पर पिछले 50 सालों में लगभग सभी सरकारों ने अपने इच्छा अनुसार इसे बर्बाद किया है और अपने राजनैतिक हित साधे हैं। 2014 तक BJP कांग्रेस को आरोपित करती रहती थी। और किसानों के बदहाली के लिए जिम्मेदार बताया करती थी। 2014 लोक सभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने किसानों के तरक्की के लिए ढ़ेर सारे वादे किए। जैसे फसल कीमत के लिए स्वामीनाथन आयोग लाने की बात, विशेष कृषि प्रणाली स्थापित करना, कर्ज माफी, भुमि शोधन इत्यादि। पर मोदी जी के अबतक के कार्यकाल को ध्यान से देखा जाए तो सभी कृषि  योजनाओं पर राजनिति की मोहर दिखती है। सरकार ने सभी मामलों को कर्ज माफी और बीमा पर लाकर पटक रखा है। बहुत से ऐसे जरूरी मुद्दे हैं जिन पर तो बात भी नहीं होती। जैसे किटनाशक से होने वाले मौंत, भुखण्ड के प्रर्विती में परिवर्तन, किसानों के स्वास्थ तथा किसानों के शिक्षा स्तर इत्यादि। कुछ मुद्दों पर थोड़ी बहुत बात होती तो है जैसे फसल कीमत, कृषि व्यवस्था या कृषि यंत्रों की आधुनिकीकरण इत्यादि। पर ऐसे मुद्दों को सरकार और मिडिया दोनों ही अनसुना कर देती है।

आज भारत के किसान का प्रतीमाह आय 2000 से भी कम है। The Indian Express में अक्टुबर 2017 में छपे एक रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र के यावतमाला अस्पताल में किटनासक के वजह से लगभग 50 से ज्यादा किसानों की मौत, 800 से ज्यादा किसान बीमार तथा कई किसानों की आंखे जाने की खबर सामने आई।

समझना होगा, किसानों की समस्याओं का मूल वजह क्या है? कृषि हमारे लिए आवश्यक क्यो है? तथा सबसे जरूरी, किसानों की मूल समस्याएं क्या है? सरकारों ने अपने फायदे के लिए कृषि भूमि को बेचा जिससे किसान भूमिहीन होते गए। उसके तर्क में कई लोग तकनीकीकरण इत्यादि का हवाला दे सकते हैं। पर इसके तकनिकीकरण के चक्कर में कोई ऐसा उपाय नहीं किया गया जिससे भुमिहीनता जैसी समस्या को रोका जा सके। कृषि की आवश्यकता के लिए केवल यह कहना कफी नहीं है की इससे खाने को अन्न मिलता है। कृषि भारत के 50% से ज्यादा लोगों के जिने का आधार है। पर एक तरफ तो पुंजिपती हजारों करोड़ लूट बैक-टू-बैक सफलता पुर्वक फरार हो रहे हैं और सरकार उन्हें शय दे रही है। तो दुसरी ओर किसानों को महज 90000 हजार ट्रैक्टर लोन के लिए उसी ट्रैक्टर के नीचे कूचल कर और अपनी मांगों के लिए आंदोलन कर रहे किसानों पर गोलियां चला कर मार दिया जाता है।

मोदी सरकार ने अबतक के अपने सभी बजट में कर्ज माफी और बीमा को भीख के तरह प्रस्तुत किया है। जिससे ज्यादातर राज्यों में किसानों का मजाक बनाया गया है। उत्तर प्रदेश के योगी सरकार ने अपने मनोनीत तरीके से कर्ज माफी की ऐसी योजना पेश किया जिसमें एक तिहाई के लगभग किसानों के 80 पैसे, 1 रुपए, 500 रुपए, 1000 रुपए माफ हुए। मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री रहते हुए वर्तमान उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू ने बयान दिया था कि किसानों ने कर्ज माफी को फैसन बना लिया है।

बहरहाल ये बात साफ है कि किसानों की समस्याओं को दूर करने के लिए कर्ज माफी का ढ़ोल और बीमा का पेटारा एक मुकम्मल उपाय नहीं है। मशहूर किसान नेता और स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव के एक रिपोर्ट के अनुसार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना एक धांधली का अड्डा बन चुका है। जिसमें वीतीय वर्ष 2016-2017 के तहत 25% से भी कम किसान कवर हुए। और उसके 12% को बड़ी मुश्किल से रिटर्न मिल पाया। सवाल यह भी है, क्या यह रिटर्न 100% को भी मिल जाता तो यह एक मुकम्मल उपाय हो पाता? नहीं!

राष्ट्रवाद के नाम पर धर्म के संस्थाओं को सहयोग दे रहे नागरिकों को समझना होगा की कृषि समाज के हर तबके से जुड़ा है। चाहे वो दलित हो, पिछड़ा हो या समान्य वर्ग। होनहार युवाओं एक ऐसा राष्ट्रवाद बनाओ जो किसानों के लिए हो। जिससे तुम फक्र से कह सको की "मैं किसान का बेटा हूं"। ताकि तुम्हारे पिता तुम्हारी पढ़ाई का खर्च दे सके। बहन की शादी और अन्य खर्चे के लिए रुपए जुटा सके। 

साथ ही समाधान के लिए किसानों को मजबूती से एक साथ आना होगा। अपनी मांगे और स्पष्ट करनी होगी। अपनी मांगों को मनवाने के लिए सरकार को मजबूर करना होगा। कहना होगा की एक बार पूरे देश के किसानों का कर्ज माफ हो ( जो राशि माल्या और नीरव द्वारा चुराए गए पैसे से बहुत कम है)। साथ ही फसल कीमत के लिए स्वामीनाथन आयोग को लागू किया जाए। सुखा, बाढ़, कृषि यंत्र, उर्वरक, मंडी, गोदाम इत्यादि के लिए अत्याधुनिक मापदंड स्थापित हो। वर्ना आर्थिक आधार बदलने के शौक में कृषि को नजरंदाज करने की आदत। जो हमें मानसिक तौर पर विकलांग कर चुकी हैं। वो जल्दी ही आर्थिक तौर पर भी पूरी तरह से विकलांग कर देगी।

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Beti Bachao-Beti Padhao; Policies and Promises

Almost 3 years ago, ‘Beti Bachao-Beti Padhao’ one of the flagship schemes aimed to address gender imbalance and discrimination against the girl child was launched by Prime Minister Narendra Modi. In fact, this is one of the major schemes introduced by the government to generate awareness and improve the efficiency of welfare services intended for girls.

This is a national initiative jointly run by the Ministry of Women and Child Development, the Ministry of Health and Family Welfare and the Ministry of Human Resource Development to address the issue of the declining child sex ratio (CSR) across the country. Even though, this has been implemented in various states, how far it has achieved its objective is a question as the recent report of the Economic Survey 2017-18 on over 21 million 'unwanted girls' in India highly contradicts the mission and vision of the project.

The strategies employed to successfully carry out the scheme are as follows.

  • Implement a sustained Social Mobilization and Communication Campaign to create equal value for the girl child and promote her education.
  • Place the issue of decline in CSR/SRB in public discourse, improvement of which would be an indicator of good governance.
  • Focus on Gender Critical Districts and Cities.

According to NITI Aayog’s report on Sex Ratio at Birth (SRB), there was a significant decline of 10 points or more recorded in various states. In Gujarat, the Sex Ratio at Birth dipped to 854 females from 907 females per 1,000 males. Gujarat was closely followed by the state  of Haryana which registered a decline of 35 points and the trailed by Rajasthan (32 points), Uttarakhand (27 points), Maharashtra (18 points), Karnataka (11 points), Chhattisgarh (12 points), Himachal Pradesh (14 points) and the list goes on. Favorably, Punjab was registered with the refinement of an increase of 19 points, followed by Uttar Pradesh (10 points) and Bihar (9 points).

Even though ‘Beti Bachao-Beti Padhao’ scheme was introduced by the Modi government in Haryana, known to be an unsafe land for both women and children, in the year 2015 with so much boasting and exaggeration, ground reality hasn’t changed a bit so far. This not only implies the publicity given to each campaign but also demonstrates the shortfalls in executing these policies at grass root level.

The real menaces like child marriage, child labour, selective sex abortion aren’t taken seriously in various states though they are illegal. Atrocities and assaults against children and women aren’t even dwindling even after so many protests and agitations. Those policies implemented by the government after investing a huge amount of money are also falling flat on various grounds. The issues can only be resolved if the change begins within. And, instead of advertising so much on the schemes for mere publicity, the government’s focus should shift to educate the public and delivering what they have promised.

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Being "INHUMAN"?

“I have to die anyway, so I am killing you: Man to passenger before kicking him out of moving train”  was a headline appeared on a media channel regarding a 23-year-old's death as he was kicked out of a moving train by a stranger in Bhopal. To an utter shock, there were no reasons for this action as both of them were strangers to each other.

The victim was sitting near the door of a general coach of Kamayani Express when the stranger kicked him out. Appallingly, it happened without any apparent provocation. The only sentence uttered by the accused before kicking him out was, ‘I am going to die anyway, so I am killing you.’

Killing someone, whoever be it, is not something which can be encouraged. And in most of the cases, the perpetrators aren’t punished or taken into the custody for any sort of execution. Not only has it questioned the sense of responsibility of the law and order in the country, but also the mindset of people who dare to take someone else’s life.

The issue sounds very simple and ordinary these days as we have got habituated of listening to all sorts of horrific stories of the human deed on a regular basis. Less society feels agitated and frantic over incidences like this, the more we get into trouble. On the contrary, we have so many other so-called serious issues like ‘Padmavat, Gau Raksha, Taimur Ali Khan etc.’ to talk about endlessly.

If the country has reached such a level where a stranger can kill someone out of his/her sheer viciousness, we have to think how much our value system and tradition of non-violence have degraded and shattered. Rather than blaming the system for each and everything, let us take up the responsibility and #RaiseOurVoiceAgainstSocialInjustice. We mustn’t wait for our turn to come, but grabbing every opportunity to be the change is in our hands.

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'मोदी' डुबाएँगे बीजेपी की नाव!

“न खाऊँगा - न खाने दूँगा” का वादा करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अब तक का कार्यकाल “खाने दूँगा - जाने दूँगा” पर आधारित दिख रहा है। भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों ने 2014 के आम चुनाव जीतने के बाद कहा था कि देश मोदी मय हो गया लेकिन अब पूरे देश को लग रहा है कि देश मोदीमय तो नहीं, मोदी ग्रस्त ज़रूर हो गया है। ललित मोदी से लेकर नीरव मोदी तक देश का शोक बन गए हैं। घोटाला करना और फिर देश छोड़कर भाग जाना इतना आसान शायद ही कभी रहा हो, जितना आज है। राजनैतिक विश्लेषक सिद्धार्थ मजूमदार ने पीएनबी घोटाला और वर्तमान राजनैतिक हालातों पर हमसे बातचीत की। 

सिद्धार्थ ने बातचीत के दौरान कहा “2019 के आम चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं हैं। और जैसे जैसे चुनाव नज़दीक आएँगे वैसे वैसे इस तरह के घोटाले सामने आते रहेंगे। भ्रष्टाचार के खिलाफ जमकर बोलने वाले नरेंद्र मोदी की खामोशी बीजेपी के लिए घातक होगी। जनता जानना चाहती है कि आधार कार्ड को बैंक अकाउण्ट से लिंक कराने का ड्रामा क्या केवल आम जनता के लिए रचा गया था? क्या नीरव मोदी का बैंक अकाउण्ट उनके आधार कार्ड से लिंक था? राजनीति छवि का खेल होता है। घोटालों के मुद्दों पर प्रधानमंत्री की चुप्पी उन्हें आगामी चुनावों में नुकसान पहुँचाएगी।” 

देश में किसान लोन के कर्ज़े तले दबकर आत्महत्या कर रहे हैं। सरकारों के पास इतना पैसा नहीं है कि किसानों को इस बोझ से निकाला जाए। लेकिन एक हीरा व्यापारी जिसके सरकार से अच्छे खासे ताल्लुकात हैं, पीएनबी को 11400 करोड़ का चूना लगाकर देश से बाहर चला जाता है। गौरतलब है कि पीएनबी को विजिलेंस का एक्सीलैंस अवॉर्ड मिला है। सवाल यह उठता है कि आखिर लगभग 7 सालों से चल रहे घोटाले की भनक किसी को क्यों नहीं लग सकी? 

सिद्धार्थ कहते हैं कि “सरकार की इससे बड़ी नाकामी हो ही नहीं सकती कि उनके नाक के नीचे इतने बड़े घोटाले को अंजाम दे दिया गया। अपनी भाषण कला और वाक्पटुता के जरिए लोकप्रिय हुए पीएम मोदी का घोटालों पर मौन बीजेपी के मिशन 2019 को कमज़ोर करेगी। चाहे राफेल डील हो या पीएनबी घोटाला, सीमा पर सैनिकों की शहादत हो या देश के अंदर अराजक तत्वों की गुण्डागर्दी; प्रधानमंत्री मोदी ने मौन अपनाया हुआ है।” वो आगे कहते हैं कि “विपक्ष को एक अच्छा मौका मिल गया है। पीएनबी घोटाले और पीएम की मौन को लेकर वो जनता के बीच जा सकते हैं। बीजेपी अब इन सवालों पर चुप नहीं रह सकती और अगर चुप रही तो 2019 के चुनावों में इसकी सीटों की संख्या 200-210 के बीच रह जाएगी।”

बहरहाल एक बात तो तय है कि भ्रष्टाचार खत्म करने के दावे के साथ सत्ता में आई बीजेपी भी धीरे धीरे भ्रष्टाचार में डूबती नज़र आने लगी है। मनमोहन के मौन को लताड़ने वाले पीएम आज खुद मौन हो गए हैं। यह तो भविष्य ही बताएगा कि क्या अपनी छवि के लिए ही सही बीजेपी और खुद पीएम मोदी भ्रष्टाचार के खिलाफ उसी तरह से आवाज़ उठा पाएँगे जैसा सत्ता में काबिज़ होने से पहले करते थे।

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झूठी है 'यथा राजा- तथा प्रजा' की सीख

बड़ी लोकप्रिय सूक्ति है - यथा राजा तथा प्रजा मतलब जैसा राजा होता है, वैसी ही प्रजा होती है। लेकिन सच्चाई के धरातल पर यह बात बिल्कुल भी ठीक प्रतीत नहीं होती। Global Hunger Index के एक हालिया रिपोर्ट में 119 देशों की सूची में भारत को उन 44 देशों में आता है, जिसे भुखमरी के मामले में गंभीर श्रेणी में रखा गया है। ये है भारत की प्रजा के हालात और अगर बात करें राजाओं की मतलब देश के अलग अलग राज्यों के सीएम की तो बता दें कि 81% भारतीय मुख्यमंत्री करोड़पति हैं, जिनमें से दो मुख्यमंत्रियों के पास १०० करोड़ से ज्यादा की संपत्ति है जबकि 55 प्रतिशत सीएम के पास 1-10 करोड़ तक की संपत्ति है। स्पष्ट है कि यथा राजा तथा प्रजा की सीख झूठी है।

देश का युवा रोज़गार के लिए भटकता रहता है।सरकारी नौकरियों की राह देखते देखते उसकी आँखे पथरा जाती हैं और जब प्रधानमंत्री से बेरोज़गारी के बाबत सवाल पूछा जाता है, तो वो कहते हैं कि पकौड़ा बेचना भी एक तरह का रोज़गार है। देश की जनता को पकौड़े बेचने में लगाकर खुद नोट छापने का राजनैतिक प्रचलन किसी एक पार्टी या क्षेत्र का नहीं बल्कि कमोबेश पूरे देश का है। 

ख़ैर, Association of Democratic Reforms तथा National Election Watch के द्वारा जारी किए गए एक रिपोर्ट में भारत के मुख्यमंत्रियों के बारे में और भी अनेकानेक सूचनाएँ शामिल हैं- 

आपराधिक रिकॉर्ड - 

भारत के 26 प्रतिशत मुख्यमंत्रियों पर गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज़ हैं। बीजेपी के देवेंद्र फड़णवीस महाराष्ट्र के साथ साथ इस सूची का भी नेतृत्व कर रहे हैं। देवेंद्र फड़णवीस पर हत्या, हत्या की कोशिश, बेइमानी समेत अन्य आपराधिक मुकदमे दर्ज़ हैं। दूसरे नंबर पर हैं केरल के पिनरई विजयन और तीसरे नंबर पर हैं - देश की राजनीति को नई दिशा देने की बात कहकर जनआंदोलन से राजनीति में आए अरविंद केजरीवाल। 

शिक्षा -

संगीन अपराधों में संलिप्त इन मुख्यमंत्रियों की शिक्षा पर नज़र डालें तो हैरानी बढ़ जाती है। देश के ३२ प्रतिशत मुख्यमंत्रियों ने प्रोफेशनल शिक्षा ली हुई है। वहीं ३९ प्रतिशत ग्रेजुएट हैं। 16 प्रतिशत मुख्यमंत्रियों ने पोस्ट ग्रेजुएशन की हुई है जबकि 3 प्रतिशत मुख्यमंत्रियों के पास डॉक्टरेट की डिग्री है। केवल 10 फीसदी मुख्यमंत्री ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई नहीं कर पाए।

पढ़े - लिखे अपराधी - 

आपराधिक मामलों में शीर्ष पर चल रहे देवेंद्र फड़णवीस शिक्षा से एक लॉ ग्रेजुएट हैं। पिनरई विजयन ग्रेजुएट जबकि अरविंद केजरीवाल एक ग्रेजुएट प्रोफेशनल। अच्छी शिक्षा पाने वाले ये मुख्यमंत्री आपराधिक मामलों की सूची में टॉप थ्री में हैं।

नेता अमीर जनता गरीब - 

आंध्र प्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू शीर्ष स्थान पर काबिज हैं। नंबर दो पर हैं अरुणाचाल के प्रेमा खांडू। और तीसरे नंबर पर हैं पंजाब के कैप्टन अमरिंदर सिंह। प्रति व्यक्ति आय के आँकडों के मुताबिक ये राज्य 15वें, 12वें और 19वें स्थान पर हैं। मतलब कि जनता और जनता की आय जाए भाड़ में, अपनी तिजोरी भरती रहे - यही इन नेताओं की नीति है। वैसे, मानिक सरकार, ममता बनर्जी और महबूबा मुफ़्ती सबसे कम संपत्ति वाले सीएम हैं।

उपर के आँकड़ों से राजनीति के चरित्र का पता चलता है। जिन लोगों को नैतिकता के उदाहरण समाज में रखने चाहिए, उनका नैतिकता से कोई लेना देना ही नहीं रह गया है। शिक्षा और आचरण में कोई बैलेंस नहीं दिखता है। यही कारण है कि ज़रूरी मुद्दों की जगह राम मंदिर, हिंदु मुसलमान, गाय, हज आदि ने ले लिया है। संविधान राजनीति पर चैक रखने की ज़िम्मेदारी और अधिकार जनतो को देता है। जब तक हम इसका उपयोग नहीं करेंगे, तब तक राजनीति और राजनेताओं को कोसने के अलावा कुछ नहीं कर पाएँगे।

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'Humiliating' Virginity Test for Newly Weds; A Reality in India

Why do you think 'virginity' is the “only” thing to be cared about till a girl gets married? The notion of safeguarding or protecting virginity has been imposed on the parents as well as on the girls since they’re born.

Why even talking about sex and sexuality a great taboo in India?

There was a time when the girls used to be forced to undergo a "virginity test" on their wedding night in order to ascertain whether or not she was "virtuous". The test is seen as an integral part of any wedding conducted within the community. Still, in some parts of the country, the highly influential panchayat (local village council) enforces this test and decides the character of a woman.

The couple is given a white sheet and taken to a hotel room rented by the village council or one of the families. They are expected to consummate the marriage while the two families and council members wait outside. If the bride bleeds during intercourse she is seen as a virgin, and if she does not, the consequences can be severe.

As reported by BBC, a movement to stop newly-wed brides from a nomadic tribal community having to take a virginity test has begun in the western Indian state of Maharashtra, and campaigners are determined to put an end to the "humiliating" practice.

To an utter shock, grooms are even allowed to annul their marriages if their wives have not "proven" their purity. Not just this, the women in question are publicly humiliated and beaten by family members because of the "shame" they have caused. This continues despite many experts having debunked the theory that a woman always bleeds the first time she has intercourse.

Why have the girls been told since their childhood that virginity is higher than their self-respect?  The attitude towards women in India must change as they should get what they actually deserve.

If a girl has to go through a test which proves her ‘purity’, why not for a man? If ‘virtue’ is the priority, that applies to them as well. Right?  The concept of a girl being an inferior gender is one of the reasons why toxic actions are being carried out by the society in the name of sheer asininity. Rather than spending time and energy on ridiculous issues like virginity test, society must focus on dealing with the issues of infant mortality and malnutrition which is killing our future generation.

Educating the society that virginity test is not the serious thing in the universe to talk about is really the need of the hour.

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Agricultural Crisis needs to be addressed

Agriculture has suddenly catapulted into the center stage due to this year being an election year. And this is likely to continue into the next year. The states are high and so will be the rhetoric. Much of the discussion is focused on remunerative prices for the farmers to get their fair share of profitability even to eek out a living. 

In this political perception game of fooling the farmers, the reality of sources and uses of funds are being lost. Lets face it, irrespective of the parties in power, the economics of doing so are daunting. Be as it may, there is more to agriculture than remunerative pricing. These are important issues no doubt but these will not effectively solve the problem without an holistic approach to the issue. 

Modi Government growth strategy hinges on reforming the industrial sector on a priority basis so as to attract investments and FDI to create jobs even though it could be argued that it will mostly benefit the middle class and their aspirational requirements. For this to happen, it has to provide infrastructure such as roads, airports, electricity etc. 

The challenge for the government with limited resources and compulsion to keep fiscal deficits within 3-4%, is to prioritize between the focusing on the industrial infrastructure or agricultural infrastructure, given that 78% rural population depend on agriculture for their livelihood. This requires a paradigm shift in the mindset of our leadership.

Sairam rightly states that we are in the midst of an agricultural crisis. If attention is not paid, we run the risk of putting the country in harms way in the near future..  Drought is a here to stay. According the “world on Edge” by Lester Brown  in the last 50 years, nearly 24,000 villages of south China had to be abandoned due to lack of water. Israel has faced four consecutive years of drought. While it can be argued that a fair share of its occurrence is manmade, there is sufficient empherical evidence to demonstrate that global temperature rising is causing water scarcity. Moreover, a UN Report concludes that by 2050, nearly all of India and three fourths of China will face severe water scarcity. The story behind this misery have repeatedly been un-remunerative procurement prices, crop failures due to weather vagaries, high interest or lack of access to finances in a timely manner, degradation of lands due to sewerage, chemicals, seawater intrusion, industrialization and the list goes on. 

These facts are a wake up call that the nation needs to take seriously and work on long term perspectives in a bipartisan way to develop strategies going beyond the myopic electoral perspectives. The nation is, in a nutshell, facing the challenges of water scarcity, declining agricultural investments, increasing unemployment and trust deficit in the system. Resolving this will require a herculean task that needs leadership that can extend across all sections, teamwork and serious effort at austerity. The country cannot survive with out food and so it is no brainer that agriculture has to be made the epicenter of any strategic alternatives and plans. 

It follows that the Government’s first focus is on building the agricultural infrastructure. There is an urgent need for developing an extensive network of drip irrigation network in India. 85% of the farmers have less than one-acre land and so they cannot afford Rs 1,00,000 needed to adopt drip irrigation. There is a clear correlation between increased productivity even while saving nearly 50% water resource.  Therefore, at least for the marginal and small farmers, the Government must build the drip irrigation infrastructure. 

In addition, it needs to invest into usage of sewerage & recycled water for agriculture and investment into Desalination plants. Both these options require huge investments. 

Israel and China provide the best case studies worth emulating. China is reported to have nearly a third of its country not having drinkable water. Likewise, Israel terrain receives perhaps the lowest rainfall in the world, experiences 4 years of consecutive droughts and despite having a 33% shortage of water; it has increased its agricultural output by nearly 42%. How did Israel achieve such spectacular achievements? So, what are the lessons we can learn from them?

UTILISATION OF RECYCLED WATER AND SEWERAGE: Over 90% of the agricultural irrigation in Israel uses recycled water. This not only cuts down the costs but also saves the  much-needed resource to meet the water requirements. Government of India needs to draw up integrated water recycling plants and extensive network of piping so as to optimally use these recycled water for agricultural purposes. It is also instructive for the government to recognize that it gives priority to Agriculture water requirements even over the common people.

INVEST INTO DESALINATION PLANTS: Desalination plant technologies have been researched and being perfected. China has desalinated nearly 600,000 Cu meters of water and is aiming to touch 2mn cu meters of desalination of water. Israel gets nearly 1bn cu meters of desalinated water to meet their demand. India should take the technology from Israel and invest heavily into research in this field. With coastline of India, investment in this infrastructure will Yield rich results. 

Clearly, there are two strong drivers that can be credited for Israel’s ability to manage the challenge of meeting its annual consumption of nearly 2.2 bn cu meters while it has access only to 1.1bn cu meters of water. The first is the total Political will to tackle the issue and the second is the commitment of the people to support the efforts and comply. India faces the problem of having neither. 

Much of India’s future depends on whether the people of India can understand the herculean task and work as a team to address the issues or will continue their gullibility to absorb hypes, false promises and innuendos. The country needs leaders who can lead its people to change their mindset, tighten their seat belts and motivate them not to shy away from work hard. They need to tell the hard facts & choices that confront the people and build trust bonds to lead them to success. Do we have such leaders? Will the people allow such leaders to emerge?

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DO MIDDLE CLASS HAVE THE RIGHT TO CRITICIZE? ITS TIME FOR THE MIDDLE CLASS TO INTROSPECT

Most of the middle class has been the largest beneficiary of the system on all counts from its independence. Almost on a daily basis, we witness the public being silent spectators of accidents, rape, violence, murder, stalking, road rage and the list goes on and all of us feel outraged at the declining standards of citizenship. Over the years we, as middleclass, have lost our sensitivities to the tragedies of others and are content with our narrow self-centered issues, on the grounds of fear of being harassed/ targeted or on the rationale that the system does not allow or care for such interventions. We witnessed in the Bhopal gas tragedy how the INTOs outrage got dissipated after so much outrage back into the our daily life with no visible impact of the protest.

Every now and then the middle class demonstrate their anguish and anger in some candle light vigil or make a few speeches and then get back into their regular life and prefer to engage in discussing and criticizing all its political leaders, security personnel, administration and institutions for all the country-ills from the comfortable environments of our homes over beer or dinners? nation

While this has become characteristic of Indian ethos, it raises serious questions about the educated middle class responsibilities as citizens, nationalism and our roles in nation building.

Who has to build the nation? Is it the sole responsibility of the political leaders? Can they do that without the active support of the people? If we as educated, well to do (compared to the majority of the population) privileged people with adequate connections and background do not contribute, can we expect the poor person, struggling to even get a job, be able to stand up against the ills of the country? If the country is on a downward spiral, without the middleclass standing up can this spiral be reversed?

It has always been the middle class who have stepped in and led to change the country direction and its development. Allowing leadership to remain in the hands of the miscreants, pursuing narrow myopic objectives, perpetuating lack of transparency, fairness, ignoring ethics, morality etc. or allowing the increasing gap between the haves and have-nots unchecked will only widen the distrust and angst. Even if viewed from a personal selfish perspective, if the downward spiral is allowed to continue, it would only result in further deterioration of society and ultimately end up in a revolution.

It would be unfair to say that the entire middle class is bereft of their responsibilities or concerns. Most of the people are in many ways contributing to the society development in their own fields and careers. Can that be enough or is there a responsibility of people towards the society other than their own efforts? It would be reasonable to acknowledge many unheard of organizations & Institutions who have been working hard on changing the society. They neither get the encouragement or the financial support to support the yeoman service they have been doing in their quest to change the gross injustice or violence in the society esp. on issues of women and children. This results in even depleting their energies and enthusiasm over a period of time and turns them into skeptics and reluctant volunteers.

There are two critical problems that now confront us - Violence esp. on women and children and apathy of the citizens to intervene to stop the miscreants or tragic issues being witnessed. Do we have to wait for our own to be involved before we feel outraged? How unacceptable it is to viedo a women being molested or people beaten by few people when 50 people passively stand by to watch (helplessly!!!!!!). It defies logic, ethics, and morals. Displays the basest instincts of human character. Yet this has become a daily affair. More than anything else, these issues that have serious impact on each one of us to shake us out of our slumber.

A case is not being made that everybody needs to get involved (even though that is the most desirable in building a strong happy nation) but there are a number of things we can do that could help tackle these issues:

Make it a point to motivate those working on issues even through a small message to endorse our support. That takes only a few minutes.

We can certainly take the effort of re-tweeting others initiatives to our circle of friends to make the issues viral.

We can offer our expertise by listing our names with those working on issues that we want to support and offer help that would not take more than 4 hours a month. Is such a small contribution not our responsibility?

When they organize an event, demonstrate your contribution by showing up. It is not everyday that events are organized. Just participating for even 1 hour could not only help in encouraging people who put in long hours but also highlights the issue for the press to take note.

We can contribute financially to those working on various issues. As middle class every one has a financial crunch and can only do to a limited extent. One even cannot solve an issue and requires numerous and repeated events to drive change. Contributing even small amounts can help the cause and does not take time from your life.

Demonstrating our responsibilities to the nation by going and casting your votes is important even if it does not influence any election. All we are doing is discharging our Dharma.

Standing up for our rights and not justify the pragmatic approach of working in the system can change the way things will happen.

Being educated, it should be possible for us to engage in debates based on logic and openness to counterviews, evidence presented etc. However, we tend to avoid people with opposite views and/or indulge in emotional rhetoric. We insist on our biases more than an willingness to see what is good for the nation.

We can avoid substituting showmanship in place of hard work.

Nation bulding is brs responsibilities. It does not require too much effort from anyone to engage in nation building if we can view it as our duty and not a favour. If we cannot rise above our narrow perspectives and biases or have the courage to demonstrate our outrage, anguish and scientific temper, can we build a strong nation?

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सत्ता के ब्लैक होल में देश की अर्थ व्यवस्था

हर साल बजट सत्र में सरकार के पास अपनी नीयत दिखाने का अवसर होता है, और उसके बाद पूरे साल उसे साबित करने का। देश का गरीब, बजट तथा चुनावी वादों में अपने आप को ढूंढता फिरता है। चुनावी घोषणा पत्र तथा सरकारी रिपोर्ट में अपने ख्वाबों का आभासी प्रतिबिंब देखने वाले गरीबों को मोदी सरकार ने एक बार फिर निराश किया है।


गरीबी एक ऐसी मुसीबत है, जो देश के हर निर्माण क्षेत्र से जुड़ी हुई है। इसके अलावा एक‌ आबादी और भी गरीब है, वो जो अर्थ जगत के किसी भी क्षेत्र नहीं जुड़ पाईं। जो सरकारों की आर्थिक नीतियों के भीषण विफलताओं की प्रतीक है। मोदी सरकार अपने पिछले सभी बजटों की तरह इस बार भी ऐसी कोई योजना नहीं ला पाई जिससे अर्थ जगत से दूर रह रहे लोगों को जोड़ा जा सके।


भारत में अर्थ जगत का बहुत बड़ा हिस्सा आज भी कृषि पर निर्भर है। लेकिन बजट 2018 में कोई विशेष प्रावधान नहीं लाया गया जिससे किसानों की तरक्की सुनिश्चित की जा सके। 2022 के ख्वाब बेचने कीधुंध में सरकार ने मनचाही परिभाषा बनाते हुए किसानों को लागत मूल्य का 1.5 गुना कीमत मिलने की बात तो कर दी लेकिनगौर से देखने पर यह एक बहुत बड़ा झूठ लगता है। नये गोदाम, समृद्ध मंडियों तथा उचित कीमत के लिए किसान हमेशा से धरने देते रहे हैं। लेकिन अलग अलग सरकारें उनकी मांगों को हमेशा दरकिनार करती रही है। मोदी सरकार ने ऐसा बजट पेश किया है जो अगले चुनाव में सरकार की मदद करे या सरकार की गलतियों से गिर रही अर्थव्यवस्था से लोगों का ध्यान हटाए। कृषि से संबंधित अत्याधुनिक तकनीक, भूमि उर्वरता और संकर बीज के उत्पादन के लिए नये प्रावधान नहीं किए गए। हर साल की तरह कुछ राशि आवंटित हुई है जिसका भविष्य व्यवस्था के ‌ब्लैक‌ होल में दफन होना होगा।

शिक्षा और विज्ञान को समाज के अछूत की तरह ‌रखा गया है। जिसके बारे में मुख्य आर्थिक सलाहकार कहते हैं की "हम डेवलपिंग ‌देश है इसलिए ‌शिक्षा तथा ‌स्वास्थ्य जैसे योजनाओं पर‌‌ ज्यादा खर्च नहीं कर सकते”। स्वास्थ्य पर GDP का 2% से भी कम खर्च किया जा रहा है। देश मे 10 लाख से ज्यादा परिवार इलाज के खर्चे के वजह से अभाव में जी रहे हैं। सरकार की दो बड़ी योजनाएं ‌GST तथा नोटबंदी; दोनों ने देश के लाखों लोगों की नौकरियां छीनली हैं। सरकार ने बजट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं किया है जिससे उन्हें कोई लाभ हो जिनकी नौकरियां सरकार की गलती से गई है। गिर रही अर्थव्यवस्था के इस दौर में सरकार ने यदि शिक्षा,‌ स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मुद्दों पर अब भी कोई विशेष पहल नहीं किया तो हम और गरीब होने की ओर बढ़ जाएँगे। ऐसा दौर जब देश के GDP का 60% से ज्यादा हिस्सा 5% लोगों के पास हो और रोजगार दिन प्रतिदिन कम होता जाए तो समझ जाइए की हम डूब रहे हैं। और सरकार फिर भी कहे की हम विकास ‌कर रहे हैं तो ‌समझ जाइए की हमें ‌केवल और केवल बेवकूफ बनाया जा रहा है।

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Budget 2018-19 and Job Creation

Millions of graduates and post-graduates enter the job market every year with so many aspirations. But even after putting lots of efforts, they don’t get a dream job. Most of the times, they have to compromise either with the salary or the profile for the sake of getting employment.

Now the question is, “even after spending so much on education, why does India facing issues of unemployment and under-employment?”

We’re not running short of qualified candidates but of jobs. We have witnessed enough of debates and discussions on this very matter for long but with no outcome.

Finance minister Arun Jaitley has mentioned the word ‘employment’ 17 times in his 2017-18 budget speech whereas another often used word was ‘jobs’. In order to create employment and to aid growth, the government has increased its expenditure to Rs. 5.97 lakh crore against an estimated expenditure of Rs 4.94 lakh crore in the year 2017-18. But a recent World Bank report sent alarm bells ringing in the country claiming that over 30% of India's population aged between 15 and 29 years is NEETs (Not in education, employment or training).

In his last Independence Day speech, PM Narendra Modi had said “We are nurturing our youngsters to be job creators and not job-seekers.” But that can only come about if the micro, small and medium enterprises (MSMEs), which make a major engine of growth and employment in the country, is properly incentivized. Recognizing that fact, Arun Jaitley has lowered the corporate tax rate to 25% for companies with a reported turnover of up to Rs 250 crore in the financial year 2016-17. In last year's budget, this benefit was limited to companies with a turnover of under Rs 50 crore. According to the finance minister, this move will benefit 99% of companies filing returns, leaving them with a higher investible surplus, which in turn will create more jobs.

Hoping to further boost job creation in the formal sector, Jaitley has announced that the government will contribute 12% of the wages of the new employees in the EPF for all the sectors-instead of a selected few at present for next three years. To incentivize employment of more women and to enable higher take-home wages, the budget has also proposed to amend the EPF Act to reduce women employees' contribution to 8% for first three years of their employment while the employer's contribution will continue at 12%. The facility of fixed-term employment moreover will now be extended to all sectors (instead of just apparel and footwear sector).

Jaitley claims that creating job opportunities and facilitating generation of employment has been at the core of our policy-making. But where are the jobs these policies have created? Why are people in India still struggling to get a good job? Why are the flag bearers of ‘pro-poor government’ not taking enough steps to handle the issue of unemployment? Don’t you think it’s a great matter of concern in a poverty-stricken country like India?

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